शाहपुरा में आस्था का महासंगम, रामनिवास धाम में गूंज रहा ‘राम-राम’ ; रामस्नेही संप्रदाय का महाकुंभ फूलडोल महोत्सव पहुंचा यौवन पर

BHILWARA
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शाहपुरा-मूलचन्द पेसवानी

भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा में रामस्नेही संप्रदाय का वार्षिकोत्सव फूलडोल महोत्सव इन दिनों अपने चरम पर है। पूरे नगर में धर्म, भक्ति और परंपरा की सुगंध फैली हुई है। मुख्य महोत्सव का समापन 8 मार्च को होगा, लेकिन श्रद्धा का यह उत्सव कुल मिलाकर 25 दिनी होता है, जिसमें मुख्य आयोजन 3 से 8 मार्च तक आयोजित किया जा रहा है। संप्रदाय की मुख्यपीठ रामनिवास धाम इन दिनों किसी दिव्य लोक से कम नहीं दिख रहीकृहर ओर बिजली की रोशनी, फूलों की सजावट और ‘राम-राम’ की गूंज। महोत्सव के तीसरे दिन गुरूवार को भी परंपरागत तरीके से अणभैवाणी की शोभायात्रा राममेडिया से रामनिवास धाम तक निकली। महोत्सव के समापन पर रंगचंमी को संप्रदाय के पीठाधीश्वर आचार्यश्री के चार्तुमास की घोषणा होगी। इसके लिए आज से ही उनका चार्तुमास अपने शहर में कराने के लिए चार्तुमास की अर्जियों का वाचन आज से प्रांरभ हो गया है।



पीठाधीश्वर आचार्यश्री जगतगुरू स्वामी रामदयालजी महाराज के निर्देशन में हो रहे इस महोत्सव में प्रतिदिन आद्याचार्य महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज की अणभैवाणी की शोभायात्रा निकाली जा रही है। यह शोभायात्रा राम मेडिया से निकलकर रामनिवास धाम तक पहुंचती है। वाणीजी के साथ भक्तों की ओर से चढ़ावा भी लाया जाता है, जिसे बारादरी में आचार्यश्री को अर्पित किया जाता है। यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए अद्भुत अनुभूति बन जाता है।

बारादरी में प्रतिदिन प्रवचनों व प्रश्नोत्तरी का आयोजन हो रहा है। सुबह रामधुनि, राम नाम जप, आरती-वंदना, प्रवचन, प्रश्नोत्तरी और धर्मसभा से वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है। देश-दुनिया से रामस्नेही अनुरागी और संत यहां पहुंच रहे हैं। तिथियों के संयोग से इस बार महोत्सव छह दिन का हो रहा है, जिससे श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है। बाहर से आने वाले भक्तों के लिए विशाल भंडारे की व्यवस्था की गई है, जहां हर कोई समान भाव से प्रसाद ग्रहण करता है।

महोत्सव की खास परंपरा संतों की पंगत है। प्रतिदिन संत एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। आचार्यश्री का थाल अलग स्थान पर सजता है। वे स्वयं प्रसादी ग्रहण करने के बाद अपने सामने पहुंचने वाले प्रत्येक भक्त को प्रसाद बांटते हैं। हजारों श्रद्धालु थाल के प्रसाद के लिए कतार में खड़े रहते हैं। रामस्नेही संप्रदाय की अनूठी परंपरा के अनुसार सभी संत एक ही गुलाबी चादर में लिपटे हुए ‘राम-राम’ करते नजर आते हैं, जो समानता और भाईचारे का प्रतीक है।

इतिहास के पन्नों में झांकें तो रामस्नेही संप्रदाय की नींव संवत 1817 में पड़ी, जब स्वामी रामचरण महाराज ने भीलवाड़ा में मियाचंद जी की बावड़ी की गुफा में भजन और राम नाम का सुमिरन किया। यहीं उनके अनेक शिष्य बने, जिन्हें रामस्नेही कहा जाने लगा। 263 साल पहले फूलडोल महोत्सव मनाने की परंपरा भीलवाड़ा से शुरू हुई। संवत 1822 में शाहपुरा में रामद्वारा निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ। महाराणा के अनुरोध पर तीन बार उदयपुर में भी फूलडोल मनाया गया।

फूलडोल नाम पड़ने की कथा भी रोचक है। स्वामी रामचरण महाराज के शिष्य देवकरण, कुशलराम और नवलराम ने होली पर प्रहलाद कथा का अनुरोध किया। कथा के दौरान फूलों की बारिश होने लगी। तभी से इस आयोजन को फूलडोल कहा जाने लगा। यह परंपरा तब से निरंतर चल रही है। शाहपुरा राजा के अनुरोध पर संवत 1826 में स्वामी शाहपुरा पहुंचे। राजा भीमसिंह और उनकी माता शिष्य बने। होली पर भक्तों ने फूलडोल आयोजन की अनुमति मांगी और जागरण राम मेडिया में हुआ। इसके बाद स्थायी नया बाजार बसाया गया। आज शाहपुरा में फूलडोल का मुख्य महोत्सव होलिका दहन से रंग पंचमी तक पांच दिन का होता है।



उदयपुर में भी तीन बार फूलडोल का आयोजन हुआ। संवत 1876 में महाराज दूल्हेराम द्वारा, संवत 1930 में हिम्मतराम महाराज द्वारा और संवत 1993 में महाराज निर्भयराम द्वारा। उन वर्षों में शाहपुरा में केवल एक दिन का फूलडोल मनाया गया, लेकिन परंपरा बनी रही।

रामनिवास धाम के पंगत चौक में संतों की पंक्तियां और आचार्य के थाल की सजावट श्रद्धालुओं को भावविभोर कर देती है। भोजन प्रसादी के बाद भक्तों को प्रसाद बांटना इस आयोजन की आत्मा है। साथ ही, धार्मिक महाकुंभ में तिलक और तुंबी के दर्शन का विशेष महत्व है। रामनिवास धाम के भवन में रकार-मकार के दर्शन होते हैं। बारादरी छतरी में पत्थर पर उकेरे गए तिलक, तुंबी, रकार और मकार के चरणचिह्न श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इस भवन का निर्माण संवत 1855 से 1869 के बीच हुआ। रामस्नेही संत अपने ललाट पर गोपी चंदन का तिलक लगाते हैं, जो संप्रदाय की पहचान है।



इन दिनों शाहपुरा में हर गली, हर चौक और हर द्वार पर भक्ति की खुशबू है। फूलों की वर्षा, राम नाम की ध्वनि और गुलाबी चादरों में लिपटे संत। यह दृश्य केवल उत्सव नहीं, बल्कि परंपरा, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का जीवंत संगम है। फूलडोल महोत्सव सचमुच शाहपुरा की आत्मा बनकर चमक रहा है।

रिपोर्ट- मूलचन्द पेसवानी, शाहपुरा

बाइट- आचार्यश्री रामदयालजी महाराज, पीठाधीश्वर रामस्नेही संप्रदाय
बाइट- संत नवनीध राम महाराज
बाइट- संत मनोरथ राम महाराज
बाइट- सत्येंद्र मंडेला, गीतकार
बाइट- बालूराम सोमाणी, भक्त