भीलवाड़ा महिला बैंक का पचास करोड़ घोटाला फिर सुर्खियों में,: ईडी ने दो सौ बासठ संपत्तियां कुर्क कीं और हजारों खातेदार अब भी अपनी जमा राशि को तरस रहे

BHILWARA
Spread the love


भीलवाड़ा । भीलवाड़ा महिला अरबन को ऑपरेटिव बैंक का पचास करोड़ से बड़ा ऋण घोटाला अभी भी हजारों जमाकर्ताओं की कमाई पर भारी पड़ रहा है। सात साल पहले लाइसेंस रद्द होने के बाद भी बीस हजार से ज्यादा खातेदार अपनी तीस करोड़ रुपए से अधिक की जमा राशि का इंतजार कर रहे हैं। वसूली की सुस्ती और लाखों रुपए महीने का संचालन खर्च इस पूरे मामले को और उलझा रहा है। बैंक अगस्त दो हजार अठारह में बंद हुआ, मगर कर्मचारी आज भी चल रहे हैं और भवनों का किराया भी जारी है। दूसरी ओर, खातेदारों को अपनी ही जमा रकम के लिए दर दर भटकना पड़ रहा है।

डीसआईसीजीसी को भेजे गए बत्तीस करोड़ से ज्यादा के क्लेम में तेरह हजार से अधिक खातेदारों को मंजूरी मिली, पर अब भी तीन हजार से ज्यादा लोग क्लेम नहीं कर पाए। इनमें कई बुजुर्ग ऐसे रहे जो अब दुनिया में नहीं हैं। इनका डेढ़ करोड़ रुपए से अधिक का पैसा दोबारा डीआईसीजीसी को लौट चुका है। बैंक के पास फिलहाल मुश्किल से एक करोड़ सत्रह लाख रुपए बचे हैं।

सबसे बड़ा दर्द यह है कि बैंक के करीब पचास करोड़ रुपए के ऋण बकाया हैं, लेकिन सात साल में महज चौदह करोड़ से कुछ अधिक वसूली हो सकी है। इस साल अप्रैल से नवंबर के बीच तो केवल उनहत्तर लाख रुपए ही आए।

और अब इसी घोटाले पर ईडी ने बड़ी कार्रवाई की है। प्रवर्तन निदेशालय ने मार्च दो हजार सोलह के इस विवादित ऋण घोटाले में पूर्व अध्यक्ष कीर्ति बोरदिया और कर सलाहकार रविंद्र बोरदिया समेत पांच लोगों की दो सौ बासठ संपत्तियां कुर्क कर दी हैं। इन संपत्तियों की कुल कीमत करीब दस करोड़ रुपए के आसपास बताई गई है। शहर के कई भू माफिया और रियल एस्टेट कारोबारियों में इस कार्रवाई के बाद खलबली मच गई है।


कुर्क की गईं संपत्तियों में साईंनाथ डेवलपर्स के एक सौ इक्यानवे प्लॉट, रोशनलाल संचेती के अट्ठावन प्लॉट और देवकिशन आचार्य तथा महावीर पारख की कृषि, आवासीय और व्यावसायिक जमीनें शामिल हैं। उनके चार बैंक खातों में जमा रकम भी फ्रीज कर दी गई है।

यह पूरा खेल फर्जी दस्तावेजों पर खड़ा किया गया। जांच में सामने आया कि बैंक ने अवैध और काल्पनिक कागजों के आधार पर पच्चीस करोड़ रुपए से अधिक के ऋण मंजूर कर दिए। कई फर्जी खातों के लिए गरीब लोगों के केवाईसी दस्तावेज और हस्ताक्षर का दुरुपयोग किया गया। जिन संपत्तियों को गिरवी दिखाया गया, वे ऋण लेने वालों के नाम पर थीं ही नहीं। समझौता पत्र के नाम पर करोड़ों का कर्ज दे दिया गया।

आत्मनिर्भरता के उद्देश्य से बनाया गया था, मगर अंदर बैठे लोगों बैंक मूल रूप से महिलाओं की आर्थिक मदद और ने इसे भूमाफिया और दलालों के हाथों सौंप दिया। जांच में यह भी खुलासा हुआ कि भीलवाड़ा में लंबे समय से कई गिरोह गरीब परिवारों की जमीनें छल से खरीदकर कॉलोनियां खड़ी कर रहे हैं। इन्हीं प्लॉटों को बैंक में गिरवी दिखाकर फर्जी ऋण उठाए गए और बाद में पैसा गायब कर दिया गया।

ईडी ने साफ किया है कि भीलवाड़ा में जमीन और बैंकिंग से जुड़े इस तरह के खेल संगठित रूप से और बड़े पैमाने पर संचालित हो रहे हैं। जांच आगे और कठोर हो सकती है।