शाहपुरा मूलचन्द पेसवानी
अंतर्राष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय के प्रवर्तक, निर्गुण भक्ति के तेजस्वी सूर्य और विजयवर्गीय समाज के प्रेरणापुंज महाप्रभु स्वामी रामचरण जी महाराज की जयंती आज शाहपुरा सहित देशभर में श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाई जा रही है। महाप्रभु स्वामी रामचरण जी महाराज की जयंती पर शाहपुरा की धरती मानो अध्यात्म के रंग में रंग गई। रामनाम की गूंज, भजनों की सरिता और सत्संग की सुगंध से नगर पावन हो उठा।

महाप्रभु स्वामी रामचरण जी महाराज का जन्म माघ शुक्ल चतुर्दशी, विक्रम संवत 1776 को अपने ननिहाल सोडा ग्राम (मालपुरा के समीप) में हुआ। उनके पिता बख्तराम जी एवं माता देउजी थीं। बचपन का नाम रामकिशन था। बाल्यकाल से ही वे तेजस्वी, विवेकशील और असाधारण प्रतिभा के धनी थे। सांसारिक जीवन में रहते हुए उन्होंने राजकीय सेवा भी की, किंतु अंततः वैराग्य जागृत हुआ और वे सद्गुरु की खोज में निकल पड़े।
दांतड़ा ग्राम में उन्हें अपने जीवन का प्रकाशपुंज स्वामी कृपाराम जी महाराज मिले। वहीं से प्रभु जी का जीवन मोड़ ले गया। गुरु कृपा से वे साधना के पथ पर अग्रसर हुए और आगे चलकर भीलवाड़ा में रामस्नेही संप्रदाय की स्थापना कर निर्गुण भक्ति का ध्वज फहराया। “रामस्नेही” का अर्थ उन्होंने स्पष्ट किया राम से स्नेह रखने वाला, अर्थात उस निराकार ब्रह्म से प्रेम करने वाला जो राम, रहीम, अल्लाह सब नामों से पुकारा जाता है।
स्वामी रामचरण जी महाराज ने समाज में फैले पाखंड, आडंबर और अंधविश्वास पर करारी चोट की। उन्होंने कहा ईश्वर मंदिरों में नहीं, आत्मा में बसता है। सत्य, अहिंसा, भक्ति और आत्मबोध ही उनका जीवन दर्शन था। उनकी वाणी से निकला प्रत्येक शब्द आत्मा को झकझोरने वाला था।
उनकी अमर कृति “अनुभव वाणी” आज भी साधकों के लिए दीपशिखा है। हजारों पदों में उन्होंने ब्रह्मज्ञान, साधना और आत्मकल्याण का मार्ग बताया। यह ग्रंथ केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि अनुभूति का प्रवाह है।

उनके द्वारा प्रवर्तित शाहपुरा में प्रारंभ हुआ फूलडोल उत्सव आज रामस्नेही संप्रदाय का वैश्विक पर्व बन चुका है। चैत्र मास में होने वाला यह उत्सव भक्ति, उल्लास और साधना का अद्भुत संगम है। देश-विदेश से साधु-संत और श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। नवदीक्षितों की शोभायात्रा, संत प्रवचन और मिश्री-पताशे का प्रसाद भक्तों को आध्यात्मिक रस से सराबोर कर देता है।
महाप्रभु स्वामी रामचरण जी महाराज का निर्वाण विक्रम संवत 1855, वैशाख बदी पंचमी को शाहपुरा में हुआ। उन्होंने जीवनभर यही संदेश दिया किकृ राम कोई देहधारी राजा नहीं, बल्कि निर्गुण, निराकार, सर्वव्यापक ब्रह्म है।
आज जयंती के अवसर पर विजयवर्गीय समाज एवं रामस्नेही संप्रदाय द्वारा शोभायात्रा, भजन-कीर्तन, सत्संग और सेवा कार्यक्रम आयोजित हो रहे है। रामद्वारा में दीप प्रज्वलित हुए और वाणी पाठ से वातावरण भक्तिमय बना।
महाप्रभु स्वामी रामचरण जी महाराज का जीवन आज भी समाज को यह सिखाता है कि धर्म बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि अंतःकरण की शुद्धता में बसता है। राम से स्नेह ही जीवन का सार है यही उनका अमर संदेश है।

भव्य शोभायात्रा बनेगी श्रद्धा का शिखर-
अखिल भारतीय विजयवर्गीय मेवाड़ महासभा के तत्वावधान में शाहपुरा में आज 1 फरवरी रविवार को राममेडिया से 398 भोग थाल के साथ भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी, जो हाथी-घोड़े, बैंड-बाजे, छत्र-चंवर और शाही लवाजमे के साथ नगर भ्रमण करती हुई श्री रामनिवास धाम पहुंचेगी। नाचते-गाते श्रद्धालु शोभायात्रा के साथ धाम में प्रवेश करेंगे, जहां समापन अवसर पर विशाल धर्मसभा का आयोजन होगा और आचार्यश्री के आशीर्वचन प्राप्त होंगे।
उल्लेखनीय है कि रामस्नेही संप्रदाय की मुख्य पीठ शाहपुरा स्थित श्री रामनिवास धाम ही है। यही वह पावन धरा है, जहां से महाप्रभु रामचरण जी महाराज की विचारधारा निकली और आज देशभर में राम नाम की अलख जगा रही है।
यह आयोजन केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि समाज को सत्य, संस्कृति और साधना के सूत्र में पिरोने वाला आध्यात्मिक महाकुंभ बन गया है। शाहपुरा की धरती पर रचा गया यह ऐतिहासिक महोत्सव आने वाले समय में समाज की दिशा और दशा तय करने वाला साबित होगा।














