“आत्मा अजर-अमर है, मृत्यु निश्चित है तो भय कैसा” — संत दिग्विजय राम
“शब्द और समय का उपयोग सोच-समझकर करें, धर्म का पहला लक्षण धैर्य है”
शाहपुरा, मूलचन्द पेसवानी
विजयपुर की पावन धरा गुरुवार को भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक चेतना से सराबोर हो उठी, जब राव नरेन्द्र सिंह विजयपुर के कृषि फार्म पर मूंदड़ा परिवार की ओर से आयोजित संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा का सप्तम दिवस एवं भव्य समापन हुआ। कथा के अंतिम दिन हजारों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा और पूरा परिसर “राधे-राधे” व “जय श्रीकृष्ण” के जयघोषों से गूंज उठा।
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्नेही सम्प्रदाय के संत दिग्विजय राम महाराज ने भागवत महिमा का गुणगान करते हुए कहा कि श्रीमद्भागवत केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव जीवन को मोक्ष की ओर ले जाने वाला दिव्य मार्ग है। उन्होंने कहा कि भागवत कथा के श्रवण मात्र से ही मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और आत्मा का कल्याण होता है।
संत दिग्विजय राम ने कहा कि आत्मा अजर है, अमर है, जबकि शरीर नश्वर है। जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है, इसलिए मृत्यु से भयभीत होने के बजाय ईश्वर भक्ति में जीवन लगाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सच्चे मन से हरि स्मरण ही आत्मा के उद्धार का एकमात्र साधन है।
कथा के दौरान उन्होंने मानव जीवन के चार बड़े शत्रु — काम, क्रोध, अहंकार और तृष्णा — को विनाश का कारण बताते हुए कहा कि यदि मनुष्य इन पर नियंत्रण कर ले तो जीवन की अधिकांश विपत्तियां स्वतः समाप्त हो जाती हैं। उन्होंने कहा कि धन का अहंकार कभी नहीं करना चाहिए तथा अर्जित संपत्ति का निश्चित भाग सदैव परोपकार, गौसेवा और धर्म कार्यों में लगाना चाहिए।
अपने ओजस्वी प्रवचनों में उन्होंने कहा कि शब्द और समय दोनों अत्यंत मूल्यवान हैं, इसलिए उनका उपयोग सोच-समझकर करना चाहिए। दान की गई राशि को पुनः स्वीकार करना धर्म विरुद्ध है। गौचर भूमि और मंदिरों की भूमि पर कब्जा करना गंभीर अनैतिकता है और समाज को ऐसे कार्यों के विरुद्ध मजबूती से खड़ा होना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म का पहला लक्षण धैर्य है तथा माया सदैव भजन और भक्ति में बाधा उत्पन्न करती है।
कथा में संत दिग्विजय राम महाराज ने योग योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के 16 हजार 108 रानियों के साथ विवाह, दंतवक्र वध, शिशुपाल वध, राजसूय यज्ञ, कृष्ण-सुदामा मित्रता, सुभद्रा हरण, भस्मासुर प्रसंग, कलयुग के आगमन के लक्षण तथा राजा परीक्षित मोक्ष सहित अनेक प्रसंगों की भावपूर्ण और सारगर्भित व्याख्या की।
भजनों की मधुर प्रस्तुतियों ने श्रद्धालुओं को भक्ति रस में डुबो दिया। “म्हारो चारभुजा नाथ भाला वालो रे”, “सांवरियो है सेठ” और “म्हारी राधाजी सेठानी है” जैसे भजनों पर महिला-पुरुष श्रद्धालु भावविभोर होकर झूम उठे और कथा पांडाल भक्तिमय वातावरण से सराबोर हो गया।
कार्यक्रम का संचालन पंडित अशोक व्यास ने किया।
इस अवसर पर पूर्व मंत्री सुरेन्द्र सिंह जाड़ावत, राव नरेन्द्र सिंह विजयपुर, ग्राम सेवा सहकारी समिति मांडलगढ़ अध्यक्ष इंदिरा विनय झवर, पुरुषोत्तम झवर, शिव प्रकाश मूंदड़ा बस्सी, विजयपुर प्रशासक श्याम लाल शर्मा सहित अनेक जनप्रतिनिधि, धर्मप्रेमी एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे।
गौसेवा के लिए भेंट की 2.63 लाख की राशि
भागवत कथा के समापन अवसर पर नृसिंह गौशाला विजयपुर के लिए श्रद्धालुओं द्वारा कथा माध्यम से 2 लाख 63 हजार रुपये की राशि भेंट की गई। गौसेवा के इस संकल्प की श्रद्धालुओं ने मुक्त कंठ से सराहना की।
