भगवान श्रीराम की बाल लीलाओं ने भक्तों को किया भावविभोर

BHILWARA
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पुरुषोत्तम मास में अधिक से अधिक धर्म लाभ लेकर जीवन सफल बनाए – महामंडलेश्वर जगदीश दास उदासीन

भीलवाड़ा, 21 मई।
सनातन सेवा समिति के तत्वावधान एवं महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम जी उदासीन के सानिध्य में हरी शेवा उदासीन आश्रम सनातन मंदिर में अधिकमास के अवसर पर चल रहे सेवा-सुमिरन प्रकल्प एवं पुरुषोत्तम माह महोत्सव के अंतर्गत आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा के पांचवें दिन हरिद्वार के महामंडलेश्वर स्वामी जगदीश दास उदासीन ने व्यासपीठ से भगवान श्रीराम की मनमोहक बाल लीलाओं का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया। कथा श्रवण के दौरान पूरा पांडाल भक्तिरस में सराबोर हो गया।
महामंडलेश्वर जगदीश दास जी महाराज ने कहा कि भगवान श्रीराम की बाल लीलाएं मानव जीवन को संस्कार, मर्यादा और आदर्शों की प्रेरणा देती हैं। प्रभु श्रीराम बचपन से ही दिव्य गुणों से युक्त थे। उनकी बाल छवि, माता कौशल्या का वात्सल्य, गुरुजनों के प्रति सम्मान और सहज सरल स्वभाव सभी के लिए अनुकरणीय हैं।
उन्होंने कहा कि पुरुषोत्तम माह अत्यंत पुण्यदायी अवसर है। मनुष्य का संपूर्ण जीवन केवल सांसारिक कार्यों में ही व्यतीत हो जाता है, जबकि यह दुर्लभ मानव जीवन सेवा, सुमिरन और साधना के लिए मिला है। इस पावन माह में अधिक से अधिक धर्म लाभ लेकर जीवन को सफल बनाना चाहिए। कथा के दौरान उन्होंने भगवान श्रीराम के नामकरण संस्कार का वर्णन करते हुए बताया कि महर्षि वशिष्ठ ने चारों भाइयों का नामकरण किया तथा आनंद के सागर होने के कारण प्रभु का नाम ‘राम’ रखा गया। बाल्यकाल में चारों भाइयों की किलकारियों, पैंजनियों की मधुर ध्वनि और राजा दशरथ के आंगन में उनकी मनोहारी बाल लीलाओं का वर्णन सुन श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। महामंडलेश्वर ने काकभुशुंडि प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रभु श्रीराम की दिव्यता को देखने स्वयं काकभुशुंडि जी कौवे का रूप धारण कर आए और प्रभु ने उन्हें अपने मुख में संपूर्ण ब्रह्मांड के दर्शन कराए। उन्होंने बताया कि बालक राम अपने सखाओं के साथ खेलते हुए भी सभी के हृदय को आनंदित करते थे।
कथा में गुरु वशिष्ठ के आश्रम में भगवान श्रीराम एवं लक्ष्मण सहित चारों भाइयों के गुरुकुल गमन, अल्पकाल में वेद-पुराण, नीति एवं धनुर्विद्या में पारंगत होने तथा प्रभु श्रीराम की आदर्श दिनचर्या का भी वर्णन किया गया। उन्होंने कहा कि श्रीराम प्रतिदिन प्रातः उठकर माता-पिता एवं गुरुजनों के चरण स्पर्श कर आज्ञा लेते थे, जो आज के समाज के लिए महान प्रेरणा है। महामंडलेश्वर जगदीश दास ने कहा कि मनुष्य जीवन भी एक यज्ञ के समान है। जिस प्रकार बाल्यकाल में राम और लक्ष्मण ने ऋषि-मुनियों के यज्ञ की रक्षा कर उसे पूर्ण कराया, उसी प्रकार जीवन रूपी यज्ञ को भी बुरे विचार और विकार बाधित करते हैं। यदि जीवन में राम जैसा सत्य और लक्ष्मण जैसा समर्पण हो तो जीवन का यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हो जाता है।
उन्होंने महर्षि विश्वामित्र के यज्ञ रक्षा प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि ताड़का, मारीच और सुबाहु जैसे राक्षस यज्ञ में विघ्न डालते थे। तब महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ के दरबार पहुंचे और राम-लक्ष्मण को अपने साथ ले जाने का आग्रह किया। प्रारंभ में पुत्र मोहवश दशरथ जी विचलित हुए, किंतु गुरु वशिष्ठ के समझाने पर उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक अपने प्रिय पुत्रों को ऋषि के साथ भेज दिया। कथा स्थल पर भजन, संकीर्तन और जयघोष से वातावरण भक्तिमय बना रहा।आरती के पश्चात प्रसाद वितरण किया गया।
आज विष्णु यज्ञ एवं रुद्राभिषेक में नरेंद्र कुमार चौहान एवं नरेश कुमार चौहान ने जोड़े सहित आहुतियाँ दी और महादेव का अभिषेक किया। पुरुषोत्तम माह महोत्सव के अंतर्गत आश्रम में प्रतिदिन विष्णु यज्ञ, रुद्राभिषेक, संकीर्तन, गंगा आरती एवं विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हो रहे हैं।