मार्च में सिर्फ चुनाव नहीं, कुर्सी के नए किस्से और पुराने अनुभव भी ताज़ा होंगे।
बिजोलिया । नरेश धाकड़।
मार्च का महीना आते ही पंचायती राज की राजनीति में हलचल तेज होने लगेगी। एक साल सेठप पड़ी गांव की सरकार को अब नया जनादेश मिलने जा रहा है। राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों की तैयारियां ज़ोरों पर हैं। राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा 25 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन के बाद कभी भी चुनाव कार्यक्रम की घोषणा की जा सकती है। घोषणा के साथ ही प्रदेश में आचार संहिता लागू हो जाएगी और गांव-गांव में कुर्सी की रस्साकशी शुरू हो जाएगी।

राजनीति में कुर्सी केवल बैठने का साधन नहीं, बल्कि हैसियत, रुतबा और सत्ता का प्रमाणपत्र मानी जाती है। कुर्सी पर बैठते ही व्यक्ति के भीतर अचानक बहुमुखी प्रतिभा जाग उठती है। कम पढ़ा-लिखा भी स्वयं को किसी दार्शनिक से कम नहीं समझता। कहते हैं कुर्सी ज्ञान की देवी है-जिस पर बैठते ही अकल दाढ़ उगने लगती है।
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो अतिरिक्त ‘स्वर्ण गुणों’ से संपन्न होते हैं। ये लोग कुर्सी खींचने की कला में पारंगत होते हैं। जैसे ही मौका मिले, कुर्सी खिसका दी जाती है और व्यक्ति कुर्सी-मुक्त हो जाता है। कई बार संकट की घड़ी में कुर्सियां अस्त्र-शस्त्र का रूप ले लेती हैं और हवा में लहराती दिखाई देती हैं।
हालांकि खाप की पंचायतों में कुर्सी का कोई विशेष महत्व नहीं होता। वहां जाजम बिछती है, जहां अमीर-गरीब, पदधारी-अपदधारी, जूते वाले-बिना जूते वाले सभी एक साथ नीचे बैठते हैं। वहां न कुर्सी की खींचतान होती है और न विवाद।
इतिहास गवाह है कि राजवंश से लेकर प्रजातंत्र तक जितने भी बड़े झगड़े हुए, उनके केंद्र में सिंहासन या कुर्सी ही रही। यदि कुर्सी नहीं होती, तो शायद झगड़े भी नहीं होते। कुर्सी ही विवादों का कुरुक्षेत्र है,जो किसी का दिन का चैन और रातों की नींद उड़ा सकती है।
इसी कुर्सी की ताकत का एक दिलचस्प नज़ारा हाल ही में एक सभागार में देखने को मिला। संस्था की बैठक चल रही थी। अधिकारी मानवता, जीवन-मूल्य और समाज-कल्याण पर गंभीर व्याख्यान दे रहे थे। तभी अचानक एक सूट-बूट में सजे व्यक्ति ने प्रवेश किया-मानो उबले दूध में दो बूंद खटाई पड़ गई हो। शांत माहौल में हलचल मच गई।
आगंतुक ने मंच पर बैठे अधिकारी को संबोधित करते हुए कहा आज से और अभी से मैं इस संस्था का सर्वेसर्वा अधिकारी हूं, मेरे पास मंत्रीजी के आदेश हैं, आप तुरंत कुर्सी छोड़ें।
अधिकारी ने शांत स्वर में जवाब दिया
मेरे पास ऐसी कोई सूचना नहीं है, मैं यह कुर्सी नहीं छोड़ सकता।
एक कुर्सी, दो अधिकारी और दोनों अपने-अपने दावे के साथ आमने-सामने। बीच में पिसती कुर्सी मानो गेहूं के साथ पिसती धुन की तरह अपनी ‘सजीवता’ साबित कर रही थी।

अब जैसे-जैसे पंचायत चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, बिजोलिया सहित पूरे क्षेत्र में कुर्सी को लेकर सरगर्मियां तेज़ होती जा रही हैं। गांव-गांव में चर्चाएं हैं , कुर्सी किसकी होगी, कौन बैठेगा और कौन खड़ा रह जाएगा।
मार्च में सिर्फ चुनाव नहीं होंगे, कुर्सी के नए किस्से और पुराने अनुभव भी ताज़ा होंगे।














