फूलडोल में आस्था का मीठा रंग, रामनिवास धाम में मिश्री से तौले जा रहे नन्हे कदम ; मन्नत पूरी होने पर परिवार कर रहे प्रसाद वितरण, स्तंभजी के समक्ष श्रद्धा का अनोखा दृश्य

BHILWARA
Spread the love

शाहपुरा-मूलचन्द पेसवानी
रामस्नेही संप्रदाय के विश्वप्रसिद्ध फूलडोल महोत्सव के दौरान शाहपुरा स्थित रामनिवास धाम इन दिनों आस्था, श्रद्धा और खुशियों के अनोखे रंग में सराबोर नजर आ रहा है। यहां एक अनूठी परंपरा देखने को मिलती है, जहां परिवार में बच्चा या बच्ची होने की मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु अपने नन्हे लाडले को मिश्री से तौलकर धाम के प्रति अपनी कृतज्ञता और आस्था व्यक्त करते हैं। फूलडोल महोत्सव के दौरान यह दृश्य विशेष रूप से देखने को मिलता है, जब दूर-दराज से आए भक्त अपने परिवार की खुशियों को प्रभु चरणों में अर्पित करते हैं।
रामनिवास धाम में स्थित पवित्र स्तंभजी के समक्ष यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। भक्त जब किसी मनोकामना के साथ यहां आते हैं तो स्तंभजी के पास मोली बांधकर मन्नत मांगते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना यहां अवश्य पूर्ण होती है। जब मन्नत पूरी हो जाती है तो श्रद्धालु वापस धाम पहुंचकर स्तंभजी के समक्ष प्रणाम कर धन्यवाद अर्पित करते हैं। विशेष रूप से परिवार में संतान सुख की प्राप्ति होने पर बच्चे को मिश्री से तौलने की परंपरा निभाई जाती है और उस मिश्री को प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है। बाद में परिवारजन आचार्यश्री रामदयालजी महाराज के सम्मुख उपस्थित होकर प्रणाम करते है।


रामस्नेही संप्रदाय के संत नवनीध राम महाराज बताते हैं कि संप्रदाय के आद्य संस्थापक महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज के पावन स्तंभजी के समक्ष मांगी गई मनोकामना पूर्ण होने के असंख्य उदाहरण मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि श्रद्धालु जब रामद्वारा आते हैं तो स्तंभजी के समक्ष श्रद्धा से मोली बांधकर अपनी मनोकामना व्यक्त करते हैं और मनोकामना पूरी होने पर पुनः यहां आकर आभार व्यक्त करते हैं। संतान प्राप्ति के बाद बच्चे को मिश्री से तौलने की यह परंपरा श्रद्धा, विश्वास और आनंद का प्रतीक बन चुकी है।
इन दिनों चल रहे फूलडोल महोत्सव में प्रतिदिन ऐसे कई परिवार धाम पहुंच रहे हैं, जिनकी मन्नतें पूरी हुई हैं। सुबह से लेकर शाम तक स्तंभजी के समक्ष श्रद्धालुओं की कतारें लगी रहती हैं। कोई अपने नवजात शिशु को गोद में लेकर आता है तो कोई छोटे-छोटे बच्चों को लेकर स्तंभजी के सामने मिश्री से तौलने की रस्म निभाता है। जैसे ही बच्चे को तराजू में रखा जाता है और दूसरी ओर मिश्री डाली जाती है, वैसे ही परिवार के चेहरे पर खुशी की चमक साफ दिखाई देती है। इसके बाद वही मिश्री प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं और उपस्थित लोगों में वितरित की जाती है, जिससे पूरा वातावरण मिठास से भर उठता है।


फूलडोल महोत्सव के दौरान इस परंपरा ने धाम की आस्था को और भी गहरा बना दिया है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह केवल एक रस्म नहीं बल्कि प्रभु के प्रति कृतज्ञता और विश्वास का प्रतीक है। हर दिन दर्जनों परिवार अपने बच्चों को मिश्री से तौलकर इस परंपरा को जीवंत बनाए हुए हैं। इसी कड़ी में शाहपुरा के पत्रकार मूलचन्द पेसवानी का परिवार भी रामनिवास धाम पहुंचा। देवेंद्र पेसवानी के पुत्र होने की खुशी में परिवार ने नन्हे विनायक को स्तंभजी के समक्ष मिश्री से तौलकर अपनी श्रद्धा अर्पित की। इसके बाद मिश्री को प्रसाद के रूप में उपस्थित श्रद्धालुओं में वितरित किया गया। इस अवसर पर परिवार के सदस्यों ने धाम के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हुए कहा कि यह परंपरा न केवल विश्वास का प्रतीक है बल्कि जीवन की खुशियों को प्रभु के चरणों में समर्पित करने का माध्यम भी है।
फूलडोल महोत्सव के दौरान रामनिवास धाम में ऐसे कई दृश्य देखने को मिल रहे हैं, जहां श्रद्धा और खुशियों की मिठास एक साथ घुलती नजर आती है। नन्हे-नन्हे बच्चों की किलकारियों और मिश्री के प्रसाद की मिठास के साथ यह महोत्सव आस्था के रंगों को और भी गहरा कर रहा है।