वर्तमान समय में संतों के आदर्शों और सनातन संस्कृति के मूल्यों को अपनाने की आवश्यकता : स्वामी ज्ञानानंद तीर्थ

BHILWARA
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पुरुषोत्तम मास में हरि सेवा आश्रम में बह रही धर्मगंगा, “भक्तमाल कथा” में उमड़े श्रद्धालु
भीलवाड़ा, मूलचन्द पेसवानी
शहर के हरिशेवा उदासीन आश्रम सनातन मंदिर में पुरुषोत्तम मास महोत्सव के अंतर्गत चल रही “भक्तमाल कथा” में श्रद्धा, भक्ति और संत महिमा की अविरल धारा प्रवाहित हो रही है। सनातन सेवा समिति द्वारा आयोजित इस धार्मिक आयोजन में ज्योतिर्मठ अवांतर भानपुरा पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी ज्ञानानंद तीर्थ ने कथा के तीसरे दिन भक्तों को धर्म, भक्ति और सनातन संस्कृति का गूढ़ संदेश दिया। कार्यक्रम महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम जी उदासीन के सानिध्य में आयोजित हुआ।


कथा में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी ज्ञानानंद तीर्थ ने कहा कि संत महापुरुष मानवता के कल्याण और धर्म की रक्षा के लिए इस धरती पर अवतरित होते हैं। संतों का जीवन त्याग, तपस्या, सेवा और ईश्वर भक्ति का जीवंत उदाहरण होता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में समाज को संतों के आदर्शों तथा सनातन संस्कृति के मूल्यों को अपनाने की अत्यंत आवश्यकता है, क्योंकि यही मूल्य मानव जीवन को शांति, सद्भाव और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा प्रदान करते हैं।
उन्होंने भक्तमाल के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि सच्चा भक्त वही है, जो अहंकार का त्याग कर पूर्ण समर्पण भाव से प्रभु चरणों में स्वयं को अर्पित कर दे। कथा के दौरान उन्होंने भागवत धर्म के बारह महान आचार्यों — ब्रह्माजी, देवर्षि नारद, भगवान शंकर, सनत्कुमार, कपिलदेव, स्वायंभुव मनु, प्रह्लाद, जनक, भीष्म पितामह, बलि, शुकदेवजी एवं धर्मराज — का उल्लेख करते हुए कहा कि यही महापुरुष भागवत धर्म के वास्तविक रहस्य को जानते हैं।
स्वामी ज्ञानानंद तीर्थ ने श्रीमद्भागवत का प्रसिद्ध श्लोक —
“स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सम्प्रसीदति॥”
— उद्धृत करते हुए कहा कि मनुष्य के लिए वही धर्म श्रेष्ठ है, जिससे भगवान के प्रति निष्काम, अखंड और निरंतर भक्ति उत्पन्न हो। ऐसी भक्ति किसी सांसारिक कामना से प्रेरित नहीं होती और न ही कोई बाधा उसे रोक सकती है। निर्मल भक्ति से ही आत्मा को परम शांति और आनंद की प्राप्ति होती है।
उन्होंने कहा कि भागवत धर्म केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि भगवान के प्रति प्रेम, समर्पण और निष्काम भक्ति का मार्ग है, जो मनुष्य को मोक्ष और आत्मिक संतोष की ओर ले जाता है। कथा में उन्होंने अनेक संत महात्माओं के प्रेरणादायी प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी प्रभु स्मरण नहीं छोड़ा, उन्हें अंततः ईश्वर कृपा अवश्य प्राप्त हुई।
कथा के दौरान श्रद्धालु “हरि नाम” और “जय श्रीराम” के जयघोष से वातावरण को भक्तिमय बनाते रहे। समापन पर आरती एवं प्रसाद वितरण किया गया। पुरुषोत्तम मास महोत्सव के अंतर्गत आयोजित विष्णु यज्ञ में सुनीता गुरनानी, मुस्कान, अजय गुरनानी एवं बड़ौदा से पधारे यजमानों ने आहुतियाँ दीं तथा महादेव का रुद्राभिषेक भी संपन्न हुआ।
आश्रम में प्रतिदिन विष्णु यज्ञ, रुद्राभिषेक, संकीर्तन, गंगा आरती एवं विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धा और उत्साह के साथ आयोजित किए जा रहे हैं। आश्रम के संत मायाराम एवं गोविन्दराम ने श्रद्धालुओं से पुरुषोत्तम मास में भीलवाड़ा में बह रही धर्मगंगा की त्रिवेणी का लाभ लेने का आह्वान किया।