महाप्रभु रामचरणजी महाराज की 275वीं दीक्षा जयंती पर 108 जरूरतमंद परिवारों की सेवा
शाहपुरा। मूलचन्द पेसवानी
रामस्नेही संप्रदाय की धरती शाहपुरा में गुरुवार को आद्याचार्य महाप्रभु स्वामी श्री रामचरणजी महाराज की 275वीं दीक्षा जयंती श्रद्धा, साधना और सेवा के भाव के साथ मनाई गई। रामनिवास धाम के कार्यवाहक भंडारी संत श्री नवनिधरामजी महाराज की प्रेरणा से आयोजित नर-नारायण सेवा के अंतर्गत शाहपुरा और आसपास के क्षेत्रों के 108 जरूरतमंद परिवारों को राशन सामग्री वितरित की गई। सेवा के इस आयोजन ने दीक्षा जयंती को केवल धार्मिक स्मरण का अवसर न बनाकर लोकमंगल और परोपकार की भावना से जोड़ा।
रामस्नेही परंपरा में साधना और सेवा को जीवन के अभिन्न अंग के रूप में देखा जाता है। इसी भाव के अनुरूप महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज की दीक्षा जयंती पर जरूरतमंद परिवारों तक खाद्य सामग्री पहुंचाई गई। आयोजन में विभिन्न स्थानों से जुड़े श्रद्धालु परिवारों ने सहयोग किया। लक्ष्मीनारायण लढ़ा, चित्तौड़गढ़ निवासी एवं वर्तमान में अहमदाबाद प्रवासी, रामप्रसाद विजयवर्गीय, जयपुर, चिमनलाल पंवार, चारमीनार कुमकुम एवं गरम मसाला, हैदराबाद तथा सतीश काबरा, अहमदाबाद की ओर से सेवा कार्य में सहयोग किया गया।
दीक्षा आत्मिक परिवर्तन की प्रक्रिया -संत नवनिधराम
इस अवसर पर भंडारी संत नवनिधरामजी महाराज ने कहा कि दीक्षा केवल किसी धार्मिक विधि का नाम नहीं, बल्कि साधक के जीवन को दिव्य भाव की ओर ले जाने वाली आध्यात्मिक प्रक्रिया है। उन्होंने दीक्षा की महिमा को स्पष्ट करते हुए कहा कि दीक्षा अभीष्ट सिद्धि प्रदान करने वाली विधि है, जो मंत्रों को शक्ति प्रदान करती है। दीक्षा साधक के भीतर दिव्यभाव का संचार करती है और पापों के क्षय का मार्ग प्रशस्त करती है। इसी कारण आगमों के विद्वानों ने इसे ‘दीक्षा’ कहा है।
संत ने कहा कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में गुरु का स्थान केवल उपदेश देने वाले व्यक्ति का नहीं है। गुरु साधक के जीवन को दिशा देने वाला तत्व है। गुरु से प्राप्त दीक्षा साधक को बाहरी आडंबर से हटाकर आत्मचिंतन, संयम और साधना की ओर प्रेरित करती है। रामस्नेही परंपरा में यह भाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां साधना का केंद्र आंतरिक शुद्धि और परमात्मा के प्रति समर्पण है।
महाप्रभु रामचरणजी महाराज का जीवन साधना और लोकमंगल का संदेश-
संत नवनिधरामजी महाराज ने महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज के जीवन एवं व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आद्याचार्य का जीवन समाज को आत्मसंयम, भक्ति, सदाचार और मानवीय मूल्यों की दिशा देता है। महाप्रभु की साधना केवल व्यक्तिगत आत्मकल्याण तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसमें समाज के व्यापक हित का भाव भी निहित था।
उन्होंने कहा कि आज के समय में गुरु और आचार्य की परिभाषाओं को लेकर समाज में कई प्रकार के परिवर्तन दिखाई देते हैं। इन परिवर्तनों का प्रभाव सामाजिक ताने-बाने पर भी पड़ता है। आवश्यकता इस बात की है कि गुरु-शिष्य परंपरा की मूल भावना और आचार्य मर्यादा को समझते हुए उसे सनातन संस्कृति के मूल्यों के अनुरूप जीवन में उतारा जाए।
संत ने कहा कि गुरु के प्रति श्रद्धा केवल किसी व्यक्ति विशेष के प्रति सम्मान तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि गुरु द्वारा बताए गए मार्ग को जीवन में अपनाना ही वास्तविक श्रद्धा है। दीक्षा का उद्देश्य भी यही है कि साधक अपने जीवन में संयम, सत्य, सदाचार और आत्मानुशासन को स्थान दे।
दीक्षा जयंती पर सेवा का संदेश-
रामनिवास धाम की ओर से आयोजित राशन वितरण को इसी आध्यात्मिक भाव से जोड़कर देखा गया। 108 जरूरतमंद परिवारों को खाद्य सामग्री उपलब्ध कराते हुए सेवा सहयोगियों ने सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वहन किया। संत नवनिधरामजी महाराज ने सभी सेवा सहयोगी परिवारों को साधुवाद देते हुए कहा कि महाप्रभु की दीक्षा जयंती का दिन सभी के लिए फलदायी है। उन्होंने कहा कि किसी जरूरतमंद के जीवन में उपयोगी बनना भी साधना का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। सेवा में जब अहंकार का स्थान नहीं रहता और सामने वाले में मानव मात्र का भाव दिखाई देता है, तब सेवा लोकमंगल का माध्यम बनती है। नर-नारायण सेवा इसी भावना को समाज के बीच प्रतिष्ठित करती है। कार्यक्रम के दौरान सेवा सहयोग करने वाले परिवारों के प्रति रामनिवास धाम की ओर से आभार व्यक्त किया गया। विभिन्न स्थानों से जुड़े श्रद्धालुओं द्वारा शाहपुरा क्षेत्र के जरूरतमंद परिवारों की सहायता के लिए आगे आना आयोजन की विशेषता रहा।
रामस्नेही परंपरा में मर्यादा और साधना का महत्व-
रामस्नेही संप्रदाय की परंपरा में संत-महात्माओं के जीवन और वाणी का केंद्र आत्मशुद्धि, भक्ति और सदाचार रहा है। आद्याचार्य महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज की दीक्षा जयंती इसी साधना परंपरा के स्मरण का अवसर है। ऐसे अवसरों पर केवल उत्सव नहीं, बल्कि संतों के बताए मार्ग पर चलने का संकल्प भी महत्वपूर्ण माना जाता है। दीक्षा जयंती के अवसर पर हुई नर-नारायण सेवा ने इसी संदेश को व्यवहार में उतारा। एक ओर महाप्रभु की आध्यात्मिक परंपरा का स्मरण हुआ तो दूसरी ओर जरूरतमंद परिवारों तक खाद्य सामग्री पहुंचाकर सेवा को जीवन से जोड़ा गया।
सेवा में जुटे श्रद्धालु-
कार्यक्रम में सूर्यप्रकाश बिड़ला, राकेश सोमाणी, रामसहाय बिड़ला, गोपाल माली, रामसहाय अग्रवाल, नारायण सिंह सहित आयोजक परिवारों से जुड़े सदस्य एवं श्रद्धालु मौजूद रहे। सेवा कार्य के दौरान जरूरतमंद परिवारों को सम्मानपूर्वक राशन सामग्री उपलब्ध कराई गई। महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज की 275वीं दीक्षा जयंती का यह आयोजन इस भाव के साथ संपन्न हुआ कि आध्यात्मिक साधना केवल स्वयं के भीतर परिवर्तन का विषय नहीं, बल्कि उसके प्रकाश से समाज में सेवा, सद्भाव और मानवीय संवेदना का विस्तार भी होना चाहिए। रामनिवास धाम से निकला यह सेवा संदेश दीक्षा जयंती के आध्यात्मिक महत्व को लोककल्याण से जोड़ता नजर आया।
