पुरुषोत्तम मास में भक्ति, वैराग्य और सनातन चेतना की अविरल धारा प्रवाहित

BHILWARA
Spread the love


भक्तमाल कथा में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी ज्ञानानंद जी तीर्थ महाराज ने सुनाया श्रद्धा, विश्वास और शिव-राम एकत्व का दिव्य संदेश
भीलवाड़ा, मूलचन्द पेसवानी
पुरुषोत्तम मास के पावन एवं पुण्यप्रद अवसर पर सनातन सेवा समिति, हरिशेवा उदासीन आश्रम सनातन मंदिर एवं महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम जी उदासीन महाराज के सानिध्य में चल रहे आध्यात्मिक एवं धार्मिक आयोजनों की श्रृंखला में गुरुवार को श्री भक्तमाल कथा के चौथे दिवस भक्तिरस, वैराग्य एवं सनातन संस्कृति की दिव्य धारा प्रवाहित हुई। कथा का अमृतमय वाचन ज्योतिर्मठ अवान्तर भानपुरा पीठ, मध्यप्रदेश के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी ज्ञानानंद जी तीर्थ महाराज के मुखारविंद से हुआ, जिसे सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। पूरा सभागार “हरि नाम” और “जय श्रीराम” के उद्घोष से भक्तिमय हो उठा।
जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी ज्ञानानंद जी तीर्थ महाराज ने श्रीमद्भागवत के श्लोक “तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुन्जान एवात्म कृतं विपाकम्…” का भावार्थ समझाते हुए कहा कि जो भक्त हर परिस्थिति में प्रभु की कृपा का अनुभव करता है और सुख-दुःख को ईश्वर की इच्छा मानकर समभाव से स्वीकार करता है, वही अंततः भगवान के परम धाम का अधिकारी बनता है। उन्होंने कहा कि प्रेम, श्रद्धा और समर्पण से भरा हृदय ही प्रभु प्राप्ति का वास्तविक साधन है।
कथा के दौरान शंकराचार्य महाराज ने भगवान श्रीराम के दिव्य चरण चिन्हों का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन करते हुए कहा कि प्रभु श्रीराम के चरणों में अंकुश, ध्वजा, कमल, शंख, चक्र, स्वस्तिक, कलश, अर्धचन्द्र, मीन, त्रिकोण एवं इन्द्रधनुष जैसे मंगलकारी चिन्ह विद्यमान हैं, जो भक्तों के जीवन में सुख, शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करते हैं। श्रद्धालु इस दिव्य वर्णन को सुन भावविभोर हो उठे।
उन्होंने भागवत महापुराण एवं भगवान शिव की महिमा का वर्णन करते हुए कहा — “निम्नगानां यथा गंगा देवानामच्युतो यथा,
वैष्णवानां यथा शम्भुः…” अर्थात जैसे नदियों में गंगा श्रेष्ठ है, देवताओं में भगवान विष्णु श्रेष्ठ हैं, वैसे ही वैष्णवों में भगवान शंकर सर्वोपरि हैं। उन्होंने कहा कि भगवान शिव स्वयं भगवत भक्ति के आधार हैं और शिव कृपा के बिना भगवान की भक्ति दुर्लभ है।
जगद्गुरु शंकराचार्य ने “भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ” श्लोक की व्याख्या करते हुए कहा कि श्रद्धा और विश्वास ही ईश्वर प्राप्ति के मूल आधार हैं। भगवान सर्वत्र विद्यमान हैं, किन्तु प्रेम और भक्ति से ही प्रकट होते हैं — “हरि व्यापक सर्वत्र समाना, प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।”
रामेश्वरम् प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम ने स्वयं शिवलिंग की स्थापना कर “रामेश्वर” नाम दिया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भगवान राम और भगवान शिव में कोई भेद नहीं है। दोनों एक ही परम तत्व के स्वरूप हैं। कथा के दौरान वातावरण भक्तिरस, वैराग्य एवं आध्यात्मिक चेतना से सराबोर रहा।
कार्यक्रम के अंत में महाआरती के पश्चात श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया। पुरुषोत्तम मास महोत्सव के अंतर्गत आयोजित विष्णु यज्ञ में भोपाल के चंद्र लालचंदानी परिवार ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच आहुतियाँ अर्पित की तथा भगवान महादेव का रुद्राभिषेक किया।
आश्रम में प्रतिदिन विष्णु यज्ञ, रुद्राभिषेक, संकीर्तन, गंगा आरती एवं विविध धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ संपन्न हो रहे हैं। आश्रम के संत मायाराम, गोविन्दराम, ईशान राम एवं सुयज्ञ राम ने धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं से पुरुषोत्तम मास में भीलवाड़ा में प्रवाहित हो रही धर्मगंगा की त्रिवेणी का लाभ लेने का आह्वान किया।