भव्य शोभायात्रा के साथ शाहपुरा पहुँची नवीन जिन प्रतिमा, जैन समाज में उमड़ा आस्था का सैलाब
अभिषेक और शांतिधारा से हुआ मंगल अनुष्ठान, 48 दीपकों से सजी भक्तामर महाआरती
शाहपुरा-मूलचन्द पेसवानी
शाहपुरा नगरी गुरुवार को जैन धर्म की अनुपम आस्था, अनुशासन और आध्यात्मिक गरिमा की साक्षी बनी, जब सकल दिगंबर जैन समाज शाहपुरा के तत्वावधान में नवनिर्मित जैन मंदिर में 1008 पार्श्वनाथ भगवान की नवीन मनोहारी जिन प्रतिमा को नवीन वेदी पर विधि-विधान के साथ विराजमान किया गया। इस ऐतिहासिक और पुण्यमयी अवसर पर पूरा नगर भक्ति, श्रद्धा और उत्साह के रंग में रंगा नजर आया।

सुबह से ही समाजजनों में विशेष उत्साह दिखाई दिया। मंदिर प्रांगण में भगवान के जयकारों और णमोकार मंत्र की मंगलध्वनि वातावरण को पवित्र बना रही थी। श्रद्धालुओं के चेहरे पर अपार उल्लास और आत्मिक शांति स्पष्ट झलक रही थी। कार्यक्रम का शुभारंभ वेंदो के मंदिर से हुआ, जहां नवीन जिन प्रतिमा को अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ पालकी में विराजमान किया गया।
इसके बाद बैण्ड-बाजों की मधुर स्वर लहरियों और मंगल वाद्यों के बीच भव्य शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा में समाज के श्रावक-श्राविकाएं पारंपरिक वेशभूषा में बड़ी संख्या में शामिल हुए। पीले मंदिर वस्त्रों में सुसज्जित 10 श्रावकों ने पालकी को अपने कंधों पर उठाया, वहीं 6 श्रावकों ने पाषाण निर्मित 1008 पार्श्वनाथ भगवान की नवीन प्रतिमा को वाहन पर विराजमान कर शोभायात्रा की शोभा बढ़ाई।
यह भव्य यात्रा वेंदो का मंदिर, कालाभाटा मंदिर, बालाजी की छतरी, सदर बाजार, त्रिमूर्ति चैराहा, नया बाजार और कोठार मोहल्ला होते हुए नवनिर्मित मंदिर पहुंची। मार्ग में जगह-जगह श्रद्धालुओं ने भगवान के दर्शन कर पुण्य लाभ अर्जित किया। नगरवासियों ने पुष्पवर्षा कर शोभायात्रा का स्वागत किया। पूरा वातावरण “पार्श्वनाथ भगवान की जय” के जयघोष से गूंज उठा।
नवनिर्मित मंदिर पहुंचने पर प्रतिमा स्थापना का मुख्य अनुष्ठान प्रारंभ हुआ। प्रतिष्ठाचार्य पंडित लादूलाल जैन के सानिध्य में नवीन वेदी और प्रतिमा का शुद्धिकरण किया गया। शुभ मुहूर्त में वेदी पर केसर से स्वास्तिक अंकित कर अत्यंत विधिपूर्वक 1008 पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा विराजमान कराई गई। यह प्रतिमा विशेष रूप से मनोहारी और दिव्य आभा से युक्त रही, जिसके दर्शन कर श्रद्धालु अभिभूत हो उठे। उल्लेखनीय है कि इस प्रतिमा का पंचकल्याणक महोत्सव गुना मध्यप्रदेश में सम्पन्न हुआ था।
प्रतिमा स्थापना के पश्चात समस्त उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने सामूहिक रूप से णमोकार मंत्र का जाप किया। मंत्रोच्चार से मंदिर परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत हो उठा। इसके बाद प्रथम अभिषेक और शांतिधारा का सौभाग्य सेठी परिवार को प्राप्त हुआ, जो इस पूरे आयोजन के पुण्यार्जक परिवार भी रहे।
विशेष बात यह रही कि जैन समाज की परंपरा और शास्त्रीय मर्यादा के अनुरूप भगवान का अभिषेक केवल शुद्ध जल से ही किया गया। दिगंबर जैन परंपरा में जिनेंद्र भगवान पर जलाभिषेक आत्मशुद्धि, निर्मलता और वैराग्य का प्रतीक माना जाता है। यह केवल बाह्य अनुष्ठान नहीं, बल्कि भीतर के विकारों को धोकर आत्मा को पवित्र बनाने का आध्यात्मिक संदेश भी देता है। इसी पावन भावना के साथ उपस्थित श्रद्धालुओं ने गहन श्रद्धा से अभिषेक किया।
तत्पश्चात समाज के सभी श्रावकों द्वारा 108 कलशों से अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। जैसे-जैसे कलशों से जलधारा भगवान पर अर्पित होती गई, वैसे-वैसे वातावरण में भक्ति और शांति की अद्भुत अनुभूति गहराती चली गई। मंदिर परिसर में उपस्थित हर श्रद्धालु मानो आत्मिक आनंद में डूब गया।
सायंकाल कार्यक्रम का एक और अलौकिक दृश्य देखने को मिला, जब 48 दीपकों से भक्तामर महाआरती की गई। दीपों की स्वर्णिम आभा, मंत्रोच्चार की दिव्यता और भक्तामर स्तोत्र की गूंज ने पूरे मंदिर को आध्यात्मिक प्रकाश से आलोकित कर दिया। महाआरती के दौरान उपस्थित श्रद्धालु भक्ति भाव से झूम उठे।
समाज अध्यक्ष आनंद सेठी ने बताया कि नवीन जिन प्रतिमा और नवीन वेदी पर 1008 पार्श्वनाथ भगवान की स्थापना जैन समाज के लिए अत्यंत गौरव और हर्ष का विषय है। इस आयोजन को सफल बनाने में समाज के प्रत्येक सदस्य का अमूल्य सहयोग रहा। उन्होंने पुण्यार्जक परिवार के प्रति विशेष आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे धार्मिक आयोजन समाज में संस्कार, समर्पण और एकता को सुदृढ़ करते हैं।
समाज के महेन्द्र जैन ने बताया कि भगवान की पालकी यात्रा में पूरे नगर ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और हर मार्ग पर श्रद्धा का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। उन्होंने कहा कि यह आयोजन केवल प्रतिमा स्थापना का कार्यक्रम नहीं, बल्कि जैन संस्कृति, आस्था और परंपरा का जीवंत उत्सव था।
नवरतन जैन ने बताया कि गुरुवार का यह दिन शाहपुरा के जैन समाज के लिए इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज हो गया। नवीन मंदिर में 1008 पार्श्वनाथ भगवान की स्थापना ने न केवल धार्मिक उल्लास को नई ऊंचाई दी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए श्रद्धा, संयम और धर्म साधना का प्रेरणास्रोत भी स्थापित किया। भगवान पार्श्वनाथ की शांत, करुणामयी और तपस्वी प्रतिमा मानो हर श्रद्धालु को यही संदेश दे रही थी। अहिंसा, संयम और आत्मकल्याण ही जीवन का सच्चा मार्ग है।
