भीलवाड़ा। लाडपुरा से भीलवाड़ा तक फैला राष्ट्रीय राजमार्ग-758 अब नाम के लिए राष्ट्रीय रह गया है, यहाँ हालत किसी ग्रामीण कच्चे रास्ते जैसी हो चुकी है। कभी चमकती एवं मजबूत सड़क अब जगह-जगह ऊबड़-खाबड़, टूटी और धूल-भरी नजर आती है। रेत और कंकड़ों से अटी सड़क पर वाहन चलाना किसी चुनौती से कम नहीं रहा। आए दिन फिसलन और झटकों से भरे इस सफर ने अब लोगों की जान तक मुश्किल में डाल दी है।

भारी वाहनों के लगातार दबाव से सड़क की सतह जगह-जगह धंस गई है। टायरों की गहरी लकीरों में फंसकर दोपहिया वाहन चालक अक्सर संतुलन खो देते हैं। ओवरटेक करने या सामने से आ रहे वाहन को क्रॉस करने के दौरान कई बार गाड़ियाँ अनियंत्रित होकर सड़क से नीचे उतर जाती हैं। ग्रामीणों ने बताया कि राजमार्ग प्राधिकरण ने कुछ जगह मशीनों से खुदाई तो कर दी, मगर डामरीकरण अधूरा छोड़ दिया, जिससे हर गुजरने वाला वाहन खतरे की रेखा पर चलता है।
खाचरोल टोल प्लाजा पर खतरा दुगना, लाइटें बंद और स्पीड ब्रेकर अदृश्य
खाचरोल टोल प्लाजा के दोनों ओर बने बड़े स्पीड ब्रेकर बिना सूचक सफेद लाइनों के हैं। रात में ये ब्रेकर अचानक नजर आने पर कई वाहन चालक झटके से ब्रेक लगाते हैं, जिससे वाहन उछलकर क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। टोल के दोनों ओर लगी विद्युत लाइटें महीनों से बंद हैं, और अंधेरे में वाहन चलाना किसी जोखिम से कम नहीं।
इतना ही नहीं, दिशा-सूचक बोर्ड और चेतावनी संकेत झाड़ियों और विदेशी बबूलों के पीछे पूरी तरह छिपे हुए हैं। नतीजा जहां सावधानी चाहिए, वहां खतरा पहले आता है और चेतावनी बाद में दिखाई देती है।

टोल से करोड़ों की वसूली, पर सड़क मरम्मत पर खर्च न के बराबर
स्थानीय लोगों का कहना है कि खाचरोल टोल नाके से हर माह करोड़ों रुपए टोल वसूला जाता है, मगर सुविधाओं और सुरक्षा के नाम पर स्थिति जस की तस है। सड़क मरम्मत, किनारों की सफाई, लाइटों की व्यवस्था और दिशा सूचक बोर्डों की देखरेख पर 25 प्रतिशत राशि भी खर्च नहीं की जाती।
राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के अधिकारी समय-समय पर निरीक्षण के नाम पर औपचारिकता निभा रहे हैं, लेकिन जमीन पर हालात सुधारने की न तो इच्छा दिखती है, न कार्रवाई। स्थानीय वाहन चालक और राहगीर अब सवाल पूछ रहे हैं।
जब हर वाहन से करोड़ों का टोल वसूला जा रहा है, तो फिर हमें टूटी सड़कें और बुझी लाइटें क्यों मिल रही हैं?
