*वसंत विषय पर शाहपुरा इकाई की मासिक साहित्यिक गोष्ठी हुई सम्पन्न*

BHILWARA
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शाहपुरा @(किशन वैष्णव)अखिल भारतीय साहित्य परिषद शाहपुरा इकाई की मासिक साहित्यिक गोष्ठी के अध्यक्ष तेजपाल उपाध्याय व विशिष्ट अतिथि सोमेश्वर व्यास रहे। गोष्ठी में विभिन्न रसों की उत्कृष्ट रचनाओं की प्रस्तुति हुई। गोष्ठी की शुरुआत विष्णु दत्त शर्मा ‘विकल’ की सरस्वती वंदना ‘माँ शारदे उपकार दे मुझ जड़मति को तार दे।’ से हुई।


सोमेश्वर व्यास ने ‘ऋतु वसन्त का हुआ आगमन हुए प्रफुल्लित वन उपवन।’ कविता सुनाई। डॉ. कमलेश पाराशर ने ‘वसन्त जीवन में आए सही बात है पर्यावरण बिगड़ा इसमें किसका हाथ है?’ व्यंग्य रचना प्रस्तुत की। जयदेव जोशी ने ‘पीताम्बर ओढ़े धरा मुस्काए नव आकाश मंद-मंद बहती पवन भर दे सुरभित श्वास’ सुनाई। भँवर ‘भड़ाका’ ने ‘हम भी कभी आए थे गुलशन में बहार बनकर और कुछ हवा ऐसी चली कि हम बिखर गए खाक बनकर’ कविता सुनाकर जीवन की नश्वरता शब्दों में व्यक्त की। सी.ए. अशोक बोहरा ने ‘आई रे बसन्त बहार खिल उठे मन हर्ष के हर द्वार’ और ‘तू ही कर्ता तू ही कारक तू ही रक्षक तू ही मारक’ भगवान भोलेनाथ का भजन सुनाया। डॉक्टर परमेश्वर कुमावत ‘परम’ ने ‘हिन्दू सहोदर सखा बंधू है हिन्दू चिर जीवन पावन’ कविता सुनाकर हिन्दू समरसता के भाव को प्रकट किया और वसन्त विषय पर ‘सृष्टि नव सौंदर्य सजाए रूप अनुपम पाती है’ कविता प्रस्तुत की।

ओम माली ‘अंगारा’ ने ‘शिशिर का गहरा तमस-सा पहरा टूट गया नभ-भू पर नव जीवन खिलने लगा चहूँ ओर’ कविता सुनाकर वसन्त में होने वाले  प्राकृतिक परिवर्तनों को रेखांकित किया। और साहित्यिक रचना ‘नाहर नख विदीर्ण कुंजर कुंभ स्थल स्रवित रक्त-सम अति रक्तिम रौद्र नेत्र निहारकर’ सुनाकर शिवाजी के शौर्य से गोष्ठी को ओजमय कर दिया। संस्था के अध्यक्ष तेजपाल उपाध्याय ने ‘ऋतुओं का होता है क्रमिक परिवर्तन इसलिए तो हुआ है बसन्त का आगमन’ और राजस्थानी भाषा में  ‘जी’ क कांई बीमारी न हो वे वो भी उ’ई आदमी है जी’ क सुगर बी.पी. होग्यो समझल्यो वो बड़ो आदमी होग्यो’ व्यंग्य रचना सुनाकर वर्तमान परिवेश पर कड़ा शाब्दिक प्रहार किया।

बालकृष्ण जोशी ‘बीरा’ ने राजस्थानी गीत ‘कामण कांटों का’ढ सायब रे पग म’ साळ मीठी मूंडा सूं सिसकारी सायब निकाळ रे’ सुनाकर गोष्ठी को संगीतमय कर दिया। नवोदित रचनाकर दर्शन शर्मा ने ‘वसन्त आया प्रकृति में नया शृंगार लाने को पर वीर खड़ा है सरहद पर अपना शौर्य दिखाने को’ कविता सुनाकर वसन्त को सरहद पर खड़े सैनिक से जोड़ दिया। विष्णु दत्त शर्मा ‘विकल’ ने ‘मन मेरा अब मरता जा रहा है उम्र घटती रिश्ता जा रहा है’ और ‘बे बात ही हम बात क्या करें अब उनसे मुलाकात क्या करे’ गजलें प्रस्तुत की। आशुतोष सिंह सौदा ने ‘मैं तो उण सरवर नहीं जाऊँ ऐ भावज किण विध चालू पाळी’ राजस्थानी गीत सुनाया। योगेंद्र शर्मा ने मथुरा से अपनी उपस्थिति कविता ‘बसन्त आया उमंगे लाया पुष्पों की बहार है’ के माध्यम से दी। जिसका वाचन डॉ कमलेश पाराशर ने किया। गोष्ठी की विवेचना विष्णु दत्त शर्मा ‘विकल’ ने की।