1100 साल बाद फिर जागी आस्था की दिव्य ज्योति
गुलाबी पाषाण की अद्भुत नक्काशी देख श्रद्धालु मंत्रमुग्ध
शाहपुरा। मूलचन्द पेसवानी
शाहपुरा के निकटवर्ती नई राज्यास गांव इन दिनों भक्ति, आस्था और आध्यात्मिक उल्लास के महासागर में डूबा हुआ है। गांव की गलियों से लेकर भव्य जिनालय तक हर ओर “जय जिनेंद्र” के जयघोष गूंज रहे हैं। 1100 वर्षों तक भूगर्भ में विराजित रहीं दिव्य प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर शुरू हुआ दो दिवसीय धार्मिक महोत्सव रविवार को पूरे धार्मिक वैभव और उत्साह के साथ प्रारंभ हुआ। ऐसा लग रहा है मानो सदियों पुराना इतिहास फिर से जीवंत होकर गांव की धरती पर उतर आया हो।
विशाल शोभायात्रा, बैंड-बाजों, ढोल-नगाड़ों, धर्मध्वजाओं और भक्ति गीतों के बीच गांव भक्तिमय रंग में रंग गया। महिलाएं पारंपरिक परिधानों में मंगल गीत गाती नजर आईं तो युवा और बच्चे भगवान महावीर स्वामी के जयकारों के साथ शोभायात्रा में उमंग से झूमते दिखाई दिए। समारोह में जैन समाज ही नहीं बल्कि अन्य समाजों के लोगों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लेकर सामाजिक समरसता का संदेश दिया।



दो करोड़ रुपए की लागत से निर्मित यह भव्य दिगम्बर जैन जिनालय अब पूरे क्षेत्र की नई पहचान बनता नजर आ रहा है। वियतनाम के सफेद पत्थरों और बंसी पहाड़पुर के गुलाबी पाषाण से बने इस अद्भुत मंदिर की नक्काशी, विशाल शिखर और दिव्य स्थापत्य श्रद्धालुओं को पहली ही नजर में मंत्रमुग्ध कर रहे हैं। रात में विद्युत सजावट के बीच मंदिर की स्वर्णिम आभा दूर-दूर तक आध्यात्मिक प्रकाश बिखेर रही है।
महोत्सव का शुभारंभ मज्जिनेंद्र जिन बिम्ब वेदी प्रतिष्ठा, ध्वजारोहण, कलशारोहण एवं विश्व शांति महायज्ञ के साथ हुआ। मंदिर में विराजित रक्षक देव मंशापूर्ण मानभद्र को नैवेद्य अर्पित कर विश्व शांति, समाज की खुशहाली और मानव कल्याण की प्रार्थना की गई। सोमवार को शुभ मुहूर्त में मुख्य प्रतिष्ठा कार्यक्रम होगा, जिसमें सैकड़ों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है।
यह पूरा आयोजन प.पू. निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज के आशीर्वाद तथा प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी प्रदीप भैया सुयश, अशोकनगर (मध्यप्रदेश) के सानिध्य में हो रहा है। धार्मिक आयोजन में मसूदा विधायक वीरेंद्र सिंह कानावत तथा आरके मार्बल ग्रुप के चेयरमैन अशोक पाटनी की विशेष उपस्थिति रही।
गोधा परिवार की श्रद्धा और समर्पण इस महोत्सव की सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आया है। मंदिर संरक्षक रतनलाल गोधा, अध्यक्ष भागचंद गोधा, राजकुमार गोधा, कमल गोधा और शशि गोधा ने बताया कि यह जिनालय केवल मंदिर नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए धर्म, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का प्रेरणास्थल बनेगा।
इस महोत्सव के पीछे की कहानी भी किसी चमत्कार से कम नहीं है। गोधा परिवार के कमल और राजकुमार गोधा ने बताया कि वर्ष 2001 में धनोप क्षेत्र में नदी की सामान्य खुदाई के दौरान अचानक भगवान आदिनाथ, पारसनाथ भगवान और नंदीश्वर द्वीप की करीब 1100 वर्ष पुरानी प्राचीन दिगम्बर जैन प्रतिमाएं निकलनी शुरू हुईं। मिट्टी के नीचे छिपा सदियों पुराना इतिहास सामने आते ही लोग स्तब्ध रह गए। श्रद्धालुओं ने इसे धर्म का चमत्कार माना। बाद में इन प्रतिमाओं को पूरे श्रद्धाभाव के साथ नई राज्यास लाया गया और 23 मई 2001 को छोटे मंदिर में प्रतिष्ठित किया गया।
समय के साथ जब पुराना मंदिर जीर्ण-शीर्ण होने लगा तो गोधा परिवार ने संकल्प लिया कि इन चमत्कारिक प्रतिमाओं के लिए ऐसा जिनालय बनाया जाए जो युगों तक श्रद्धा का केंद्र बना रहे। 5 फरवरी 2022 को मुनि पुंगव श्री 108 सुधासागर महाराज के सानिध्य में मंदिर की नींव रखी गई और आज वह सपना भव्य हकीकत बनकर सामने खड़ा है।
मंदिर के गर्भगृह को विशेष स्वर्ण आभा से सजाया गया है, जहां भगवान महावीर स्वामी की मुख्य वेदी के साथ भगवान आदिनाथ, पारसनाथ भगवान, नंदीश्वर द्वीप, मुनि सुदृढ़नाथ सहित नौ देवताओं की धातु एवं पाषाण निर्मित प्रतिमाएं विराजमान होंगी। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि आने वाले समय में यह जिनालय क्षेत्र का प्रमुख धार्मिक तीर्थ बनेगा।
पूरे गांव को रंग-बिरंगी झांकियों, विद्युत सजावट और धर्मध्वजाओं से सजाया गया है। गांव की हर गली में भक्ति की लहर दिखाई दे रही है। महोत्सव के दौरान विशाल वात्सल्य भोज और सामूहिक प्रसादी का आयोजन भी किया गया है।
समारोह में पवन गोधा, महावीर गोधा, अंशुल गोधा, प्रकाश चंद्र जैन, पवन कासलीवाल, विनोद कासलीवाल, जितेंद्र गोधा, दिलीप गोधा, लादूलाल शाह, सुरेंद्र पाटनी, आशुतोष सेठी सहित बड़ी संख्या में समाजजन और महिलाएं मौजूद रहीं। वहीं वेद स्टोनेक्स किशनगढ़ के दिलीप कुमार वेद, निरंजन, निर्मल, प्रमोद वेद, चांवलेश्वर पार्श्वनाथ अतिशय क्षेत्र के अध्यक्ष प्रकाशचंद्र कासलीवाल तथा रणथंभौर अतिशय क्षेत्र के तरुण बंज भी विशेष रूप से शामिल होंगे। नई राज्यास का यह ऐतिहासिक महोत्सव अब केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि श्रद्धा, समर्पण, चमत्कार और सामाजिक एकता का ऐसा जीवंत अध्याय बन चुका है जिसकी गूंज आने वाले वर्षों तक सुनाई देगी।
