प्राकृतिक खेती ही स्वस्थ भारत की नींव- विधायक डॉ. लालाराम बैरवा

BHILWARA
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राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन कार्यशाला में किसानों का आह्वानकृरसायनों से दूरी बनाएं, प्रकृति से जोड़ें खेती
शाहपुरा, मूलचन्द पेसवानी
धरती तभी मुस्कुराएगी, जब खेतों में जहर नहीं बल्कि जीवन उगेगा। इसी संदेश के साथ शुक्रवार को कृषि विभाग द्वारा राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के अंतर्गत कृषि विज्ञान केंद्र, अरनिया घोड़ा में एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लेकर प्राकृतिक खेती की तकनीकों, उसके लाभों तथा सरकार द्वारा संचालित योजनाओं की जानकारी प्राप्त की।
कार्यशाला के मुख्य अतिथि क्षेत्रीय विधायक डॉ. लालाराम बैरवा ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि वर्षों से रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग ने न केवल मिट्टी की उर्वरता को प्रभावित किया है, बल्कि मानव स्वास्थ्य पर भी गंभीर दुष्प्रभाव डाले हैं। आज कैंसर, मधुमेह और अन्य गंभीर बीमारियों के बढ़ते मामलों के पीछे भोजन की गुणवत्ता में आई गिरावट भी एक महत्वपूर्ण कारण है। इसलिए समय की मांग है कि किसान प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ाएं और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित एवं पौष्टिक अन्न का उत्पादन करें।
उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती केवल एक कृषि पद्धति नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और स्वस्थ समाज निर्माण का एक व्यापक अभियान है। इससे उत्पादन लागत कम होती है, मिट्टी की जैविक क्षमता बढ़ती है और किसानों की आय में भी सुधार की संभावना रहती है। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे परंपरागत ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक सलाह का समन्वय करते हुए प्राकृतिक खेती को अपनाएं।
अपने संबोधन में विधायक डॉ. बैरवा ने “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान का भी उल्लेख करते हुए प्रत्येक किसान और नागरिक से कम से कम एक पौधा अपनी माता के सम्मान में लगाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि पेड़ केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं करते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का आधार तैयार करते हैं। यदि खेती और पर्यावरण दोनों को बचाना है तो वृक्षारोपण को जनआंदोलन बनाना होगा।
उन्होंने राज्य एवं केंद्र सरकार द्वारा किसानों के हित में संचालित विभिन्न लाभकारी योजनाओं की भी जानकारी दी और कहा कि किसानों को इन योजनाओं का अधिकतम लाभ उठाकर आधुनिक एवं टिकाऊ कृषि प्रणाली अपनानी चाहिए। उन्होंने कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम किसानों को नई सोच और नई दिशा प्रदान करते हैं।
कार्यशाला में कृषि विज्ञान केंद्र के सह आचार्य डॉ. राजेश जलवानिया ने प्राकृतिक खेती के वैज्ञानिक आधार पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि गो-आधारित कृषि, जैविक घोल, जीवामृत, बीजामृत तथा स्थानीय संसाधनों के उपयोग से खेती की लागत कम की जा सकती है और भूमि की उत्पादक क्षमता लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सकती है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती से मिट्टी में सूक्ष्म जीवों की सक्रियता बढ़ती है, जिससे फसल की गुणवत्ता और पोषण मूल्य में सुधार होता है।
इस अवसर पर डॉ. एच.एल. बुगालिया ने किसानों को प्राकृतिक खेती की तकनीकों, फसल प्रबंधन तथा जैविक पोषण के बारे में व्यावहारिक जानकारी दी। कृषि विभाग के कृषि अधिकारी भगवत सिंह राणावत, सहायक कृषि अधिकारी प्रवीण कुमार जावलिया एवं कृष्ण कुमार मीणा ने किसानों को विभागीय योजनाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों तथा प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए उपलब्ध सहायता के बारे में विस्तार से बताया।
कार्यक्रम के दौरान किसानों ने विशेषज्ञों से सीधे संवाद कर अपनी शंकाओं का समाधान भी प्राप्त किया। कई किसानों ने रासायनिक खेती से होने वाली बढ़ती लागत और मिट्टी की घटती उर्वरता पर चिंता व्यक्त की, जिस पर विशेषज्ञों ने प्राकृतिक खेती को एक व्यवहारिक एवं टिकाऊ विकल्प बताया।
इस अवसर पर कृषि विभाग के कृषि पर्यवेक्षक अनिल पारीक, महेन्द्र नायक, कैलाश चंद्र माली, केदार जाट सहित विभागीय अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे। वहीं भाजपा ग्रामीण मंडल अध्यक्ष जीवराज गुर्जर, बालाराम खारोल तथा दयाशंकर गुर्जर सहित अनेक जनप्रतिनिधियों और किसानों ने भी कार्यशाला में सहभागिता निभाई।