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यज्ञ की ज्वाला में तपे संकल्प, शाहपुरा में गरजा हिंदू चेतना का महासम्मेलन


108 कुण्डीय महायज्ञ में 1111 जोड़ों की आहुतियां, एकता का अनुपम दृश्य


शाहपुरा, मूलचन्द पेसवानी
राजकीय कॉलेज प्रांगण रविवार को सनातन चेतना के महासागर में तब्दील हो गया, जब रामस्नेही बालाजी मुखर्जी बस्ती की धरती पर ऐतिहासिक विराट हिंदू सम्मेलन का दिव्य आयोजन हुआ। सुबह होते ही यज्ञ मंडप से उठती वेद-ऋचाओं की गूंज, हवन कुंडों से उठती अग्नि-ज्वालाएं और “भारत माता की जय” के उद्घोष ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। सम्मेलन का शुभारंभ 108 कुण्डीय समरसता महायज्ञ से हुआ, जिसमें समाज के हर वर्ग के लोगों ने श्रद्धापूर्वक आहुति दी।


सम्मेलन का मूल उद्देश्य स्पष्ट था ‘संगठित हिंदू, संगठित भारत’ के संकल्प को जन-जन तक पहुंचाना। भारत माता की प्रतिमा पर दीप प्रज्वलन और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई। भगवा ध्वज लहराते रहे और मंच से “हिंदू, हिंदुत्व और हिंदुस्तान” का नारा बार-बार बुलंद हुआ। श्रद्धा, राष्ट्रप्रेम और संगठन शक्ति का यह संगम पूरे क्षेत्र के लिए अविस्मरणीय बन गया।

सामाजिक समरसता का विराट दृश्य–
महायज्ञ में 1111 जोड़ों ने सामूहिक रूप से आहुति प्रदान की। यह दृश्य सामाजिक समरसता का जीवंत प्रतीक बन गयाकृजहां जाति, वर्ग और क्षेत्र के भेद स्वतः विलीन हो गए। यज्ञ उपरांत बालाजी मंडल फूलियाकलां द्वारा प्रस्तुत आकर्षक अखाड़ा प्रदर्शन ने युवाओं में उत्साह का संचार किया। धर्मसभा के बाद आयोजित समरसता भोज में सर्व हिंदू समाज एक पंगत और एक संगत में बैठकर महाप्रसादी ग्रहण करता दिखा मानो एक ही परिवार की तरह।
राष्ट्र निर्माण और संस्कृति संरक्षण पर जोर–
सम्मेलन में वक्ताओं ने राष्ट्र निर्माण, सनातन संस्कृति की रक्षा और सामाजिक एकता पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि एक संगठित समाज ही सशक्त राष्ट्र की नींव होता है। युवाओं से समाजसेवा, संस्कारों के संरक्षण और राष्ट्रहित में सक्रिय भूमिका निभाने का आग्रह किया गया। सामाजिक जागरूकता, संस्कृति संरक्षण और राष्ट्रप्रेम जैसे विषयों पर सारगर्भित चर्चा हुई।

प्रबुद्ध वक्ताओं के ओजस्वी उद्बोधन–
यज्ञ उपरांत आयोजित हिंदू सम्मेलन धर्मसभा में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक व अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य सुरेश भाई रहे। मंच पर मातृ शक्ति रीता देवी (प्राचार्य, गर्ल्स स्कूल शाहपुरा) तथा हनुमंत धाम, शक्करगढ़ के महामंडलेश्वर जगदीश पुरी महाराज की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम को विशेष ऊंचाई दी।
सुरेश भाई ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में हिंदू समाज को संगठित करने के संघ के संकल्प को दोहराया। उन्होंने कहा कि “एक मजबूत संगठन ही राष्ट्र को शक्तिशाली बना सकता है।” सेवा भाव और किसानों की समस्याओं पर चर्चा करते हुए उन्होंने समाज को विघटनकारी शक्तियों से सतर्क रहने का आह्वान किया। बदलती डेमोग्राफी पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने समस्त हिंदू समाज से एकजुट होकर सक्रिय कार्य करने की प्रेरणा दी। उन्होंने संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार के जीवन संघर्ष और राष्ट्रव्यापी कार्यों का उल्लेख कर युवाओं में राष्ट्रसेवा का भाव जागृत किया।
महामंडलेश्वर जगदीश पुरी महाराज ने अपने आशीर्वचनों में वर्ण व्यवस्था को मानव शरीर के उदाहरण से सरल शब्दों में समझाया। उन्होंने कहा कि जैसे शरीर के सभी अंग मिलकर कार्य करते हैं, वैसे ही समाज के सभी वर्ग मिलकर राष्ट्र को सशक्त बनाते हैं। उन्होंने टूटते दाम्पत्य जीवन पर चिंता जताते हुए कहा कि शिक्षा बढ़ने के साथ समाज संस्कारों से दूर होता जा रहा है। महाराज ने हिंदुओं की एकता पर जोर देते हुए कहा कि आज हिंदू समाज जाति और क्षेत्रवाद में बंटा है, जबकि समय की मांग है कि हम एक सूत्र में बंधें। उन्होंने लव जिहाद जैसी चुनौतियों के प्रति जागरूक करते हुए हिंदू बेटियों की रक्षा और युवाओं को भारतीयता से जोड़ने का आह्वान किया।

आयोजन समिति की भूमिका–
अध्यक्षीय उद्बोधन में आयोजन समिति अध्यक्ष डॉ. पुष्करराज मीणा ने कार्यक्रम की विषयवस्तु प्रस्तुत करते हुए बताया कि संघ की 100 वर्षों की यात्रा के उपलक्ष्य में पंच परिवर्तन के अंतर्गत सामाजिक समरसता के संदर्भ में संपूर्ण राष्ट्र में लगभग 80 हजार हिंदू सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सनातन हिंदू संस्कृति सिंधु घाटी सभ्यता से भी प्राचीन है और यह केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है। अंत में अनंत चौबे ने सभी उपस्थित जनसमूह और आयोजकों का आभार व्यक्त किया।

भारत माता की आरती संग समापन–
कार्यक्रम के अंत में भारत की एकता, अखंडता और सांस्कृतिक गौरव को बनाए रखने का सामूहिक संकल्प लिया गया। भारत माता की आरती के साथ सम्मेलन का समापन शांतिपूर्ण और भक्तिमय वातावरण में हुआ।
राजकीय कॉलेज प्रांगण में आयोजित यह विराट हिंदू सम्मेलन न केवल एक धार्मिक आयोजन रहा, बल्कि सामाजिक समरसता, राष्ट्रप्रेम और संगठन शक्ति का संदेश देने वाला ऐतिहासिक पड़ाव बन गया। शाहपुरा की धरती पर उमड़ा यह जनसैलाब यह प्रमाण दे गया कि जब आस्था, संगठन और सेवा भाव एक साथ चलते हैं, तब राष्ट्र निर्माण का मार्ग स्वयं प्रशस्त हो जाता है।

KAPIL SHYAM VIJAY

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