अवैध बजरी दोहन पर उठे सवाल, प्रशासन की चुप्पी से ग्रामीणों में आक्रोश
10 किलोमीटर का अतिरिक्त सफर, पेयजल संकट की आशंका, जिम्मेदारों की जवाबदेही पर बड़ा सवाल
शाहपुरा। मूलचन्द पेसवानी
सरकारी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। शाहपुरा क्षेत्र के अरनियाघोड़ा पंचायत में शुक्रवार को हुई पहली ही बारिश ने विकास कार्यों की असलियत उजागर कर दी। नाहर सागर बांध के बहाव क्षेत्र में स्थित सरदारपुरा एनीकट की फेसवाल और सार्वजनिक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) द्वारा निर्मित पुलिया भरभराकर ढह गई।

कुछ ही घंटों की बारिश ने लाखों रुपये की लागत से तैयार इस निर्माण की मजबूती की पोल खोल दी। राहत की बात यह रही कि हादसे के समय पुलिया से कोई वाहन या राहगीर नहीं गुजर रहा था, अन्यथा यह लापरवाही किसी बड़े हादसे में बदल सकती थी।
इस घटना ने केवल एक पुलिया नहीं तोड़ी, बल्कि सरदारपुरा, सुदर्शनपुरा, श्रीनगर, सांखलिया ग्राम पंचायतों सहित कनेछन कलां का संपर्क भी एक झटके में काट दिया। अब ग्रामीणों को अपने दैनिक कार्यों के लिए करीब 10 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है। किसानों, विद्यार्थियों, मरीजों, मजदूरों और आम लोगों की मुश्किलें अचानक कई गुना बढ़ गई हैं।
पहली बारिश में ही खुल गई निर्माण की हकीकत-
ग्रामीणों का कहना है कि यदि यह पुलिया और एनीकट गुणवत्ता के अनुरूप बनाए गए होते तो पहली ही बारिश में इस तरह धराशायी नहीं होते। क्षेत्र में कोई असाधारण बारिश नहीं हुई, फिर भी पुलिया का बह जाना और एनीकट की फेसवाल का टूट जाना सीधे-सीधे निर्माण की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। लोगों का कहना है कि सरकारी फाइलों में निर्माण कार्य भले ही मजबूत और टिकाऊ दिखाए जाते हों, लेकिन धरातल पर पहली ही परीक्षा में ढह जाने वाले ऐसे निर्माण विकास नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रमाण बनते जा रहे हैं।

अवैध बजरी दोहन भी संदेह के घेरे में-
घटना के बाद ग्रामीणों के बीच एक और गंभीर चर्चा शुरू हो गई है। दबे स्वरों में लोग आरोप लगा रहे हैं कि एनीकट के आसपास पिछले कई दिनों से जेसीबी मशीनों के जरिए अवैध बजरी दोहन किया जा रहा था। इससे बहाव क्षेत्र की भूगर्भीय संरचना कमजोर हो गई और पहली बारिश में पूरी संरचना जवाब दे गई। ग्रामीणों का आरोप है कि इस अवैध गतिविधि की जानकारी प्रशासन को पहले से थी, लेकिन प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। यदि समय रहते अवैध खनन रोका गया होता तो शायद आज यह स्थिति पैदा नहीं होती। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर अवैध बजरी दोहन करने वालों को संरक्षण कौन दे रहा था और प्रशासन की कार्रवाई केवल कागजों तक ही सीमित क्यों रही?
चार गांवों की जिंदगी प्रभावित-
पुलिया के क्षतिग्रस्त होने का सबसे बड़ा असर ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ा है। चार गांवों का मुख्य संपर्क मार्ग बंद हो गया है। अब लोगों को अस्पताल, स्कूल, बाजार और सरकारी कार्यालयों तक पहुंचने के लिए लगभग 10 किलोमीटर अतिरिक्त रास्ता तय करना पड़ रहा है। किसानों के लिए यह संकट और भी गंभीर है। खेतों तक पहुंचने में अतिरिक्त समय और खर्च दोनों बढ़ गए हैं। वहीं विद्यार्थियों और नौकरीपेशा लोगों को भी भारी परेशानी उठानी पड़ रही है।
पेयजल संकट की दस्तक-
पुलिया के साथ-साथ उस पर से गुजर रही पेयजल पाइपलाइन भी क्षतिग्रस्त हो गई है। इससे संबंधित गांवों में आने वाले दिनों में पेयजल संकट गहराने की आशंका पैदा हो गई है। यदि पाइपलाइन की तत्काल मरम्मत नहीं की गई तो ग्रामीणों को पानी के लिए भी संघर्ष करना पड़ सकता है। दूसरी ओर एनीकट के क्षतिग्रस्त होने से उसमें संचित पानी लगातार बह रहा है। यदि समय रहते इस पानी को नहीं रोका गया तो जल संरक्षण की पूरी व्यवस्था प्रभावित होगी और आने वाले समय में किसानों को सिंचाई संकट का सामना करना पड़ सकता है।
सूचना के बाद भी अधिकारी नदारद-
घटना की सूचना मिलते ही ग्राम पंचायत प्रशासक प्रतिनिधि दयाशंकर गुर्जर मौके पर पहुंचे और स्थिति का जायजा लिया। उन्होंने तत्काल प्रशासन तथा संबंधित विभागों के अधिकारियों को सूचना दी। हैरानी की बात यह रही कि जल संसाधन विभाग और पीडब्ल्यूडी से जुड़े होने के बावजूद शाम तक कोई जिम्मेदार अधिकारी मौके पर निरीक्षण के लिए नहीं पहुंचा। इससे ग्रामीणों में भारी नाराजगी है। लोगों का कहना है कि हादसा होने के बाद भी यदि अधिकारी मौके तक नहीं पहुंचते तो यह प्रशासनिक संवेदनहीनता का सबसे बड़ा उदाहरण है। जनता की परेशानी से आखिर जिम्मेदार अधिकारियों का क्या लेना-देना?
अब हर काम के लिए 10 किलोमीटर घूमना पड़ रहा-
गांव के रोडूलाल माली ने बताया कि पुलिया टूटने के बाद गांव के लोगों की दिनचर्या पूरी तरह प्रभावित हो गई है। पहले जहां कुछ ही मिनटों में गंतव्य तक पहुंच जाते थे, अब हर कार्य के लिए लगभग 10 किलोमीटर अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ रहा है। इससे समय की बर्बादी के साथ आर्थिक नुकसान भी लगातार बढ़ रहा है।
समय रहते मरम्मत होती तो नहीं आती नौबत-
जीव दया सेवा समिति के संयोजक अतू खा कायमखानी ने कहा कि यदि सार्वजनिक निर्माण विभाग ने बरसात शुरू होने से पहले पुलिया का तकनीकी निरीक्षण कर आवश्यक मरम्मत कर दी होती तो आज ग्रामीणों को इस संकट का सामना नहीं करना पड़ता। उन्होंने विभाग से तत्काल अस्थायी वैकल्पिक मार्ग तैयार कर आवागमन बहाल करने की मांग की है ताकि ग्रामीणों को राहत मिल सके।
स्वतंत्र एजेंसी से जांच की मांग-
अतू खा कायमखानी ने पहली ही बारिश में पुलिया बह जाने को बेहद गंभीर मामला बताते हुए इसकी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि इतनी कम बारिश में यदि पुलिया बह जाती है तो यह केवल प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि निर्माण कार्य की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था दोनों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। उन्होंने निर्माण कार्य में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों, तकनीकी कर्मचारियों और दोषी व्यक्तियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग भी की है।
जनता पूछ रही है जिम्मेदार कौन?
यह घटना केवल एक पुलिया या एनीकट टूटने तक सीमित नहीं है। यह सरकारी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, निगरानी व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा सवाल बनकर सामने आई है। आखिर पहली ही बारिश में करोड़ों की योजनाओं का दम क्यों निकल जाता है? क्या गुणवत्ता की जगह सिर्फ कागजी खानापूर्ति होती है? क्या जांच केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी? ग्रामीणों का कहना है कि अब उन्हें केवल आश्वासन नहीं, बल्कि कार्रवाई चाहिए। दोषियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, अवैध बजरी दोहन की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और जल्द से जल्द पुलिया तथा एनीकट की मरम्मत कर आवागमन और जल संरक्षण व्यवस्था बहाल की जानी चाहिए। अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं। देखना यह होगा कि इस बार भी मामला जांच की फाइलों में दब जाएगा या फिर पहली बार जनता के भरोसे को कायम रखने के लिए जिम्मेदार लोगों पर वास्तव में कार्रवाई होगी। क्योंकि इस बार टूटी केवल पुलिया नहीं है, व्यवस्था पर जनता का भरोसा भी दरक गया है।
