*आसमान की बेरुखी, फसल पर पीला मोजेक और खेतों में सूअरों का आतंक दोहरी मार से बेहाल शाहपुरा का किसान*

BHILWARA
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शाहपुरा। मूलचन्द पेसवानी
खेत में खड़ी फसल देखकर जिस किसान के चेहरे पर संतोष होना चाहिए, वहां इन दिनों चिंता की गहरी लकीरें दिखाई दे रही हैं। शाहपुरा तहसील के गांवों में काश्तकार इस खरीफ सीजन में दोहरी मार झेल रहे हैं। एक तरफ मौसम अब तक पूरी तरह मेहरबान नहीं हुआ है और बारिश की कमी व अंतराल से फसलों की बढ़वार प्रभावित हो रही है, वहीं दूसरी तरफ मूंग और उड़द की फसल पीला मोजेक यानी पीलिया रोग की चपेट में आकर कमजोर पड़ रही है। जो फसल किसी तरह बची हुई है, उसे खेतों में घूम रहे जंगली सूअरों के झुंड बर्बाद कर रहे हैं।
किसानों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर उनकी मेहनत और खेती में लगाया गया पैसा कैसे वापस आएगा। महंगे बीज, खाद, मजदूरी, डीजल और कीटनाशकों पर खर्च करने के बाद यदि फसल ही खेत में नहीं टिकेगी तो परिवार की आर्थिक व्यवस्था कैसे चलेगी। किसानों का कहना है कि यह केवल फसल का नुकसान नहीं है, बल्कि पूरे परिवार की आय और अगले कृषि सीजन की तैयारी पर असर डालने वाला संकट है।
पीले पड़ते पौधों ने छीन ली उत्पादन की उम्मीद-
शाहपुरा तहसील की लगभग सभी ग्राम पंचायतों में मूंग और उड़द की फसल को लेकर किसानों की चिंता बढ़ रही है। प्रभावित किसानों के अनुसार कई खेतों में पौधों की पत्तियां पीली पड़ गई हैं। पौधों में अपेक्षित फूल नहीं आ रहे और फलियां भी विकसित नहीं हो पा रही हैं। इससे उत्पादन पर सीधा असर पड़ रहा है।
किसानों का दावा है कि कई क्षेत्रों में 50 से 60 प्रतिशत तक मूंग-उड़द की फसल प्रभावित हो चुकी है। खेत में खड़ी फसल दूर से भले ही हरी दिखाई दे, लेकिन नजदीक जाने पर पौधों की स्थिति किसानों की चिंता बढ़ा देती है।
किसानों की पीड़ा यह भी है कि फसल की लागत पहले ही लग चुकी है। बीज खरीदने से लेकर खेत की तैयारी, बुवाई, खाद और दवा तक किसान अपनी क्षमता से अधिक खर्च कर चुका है। अब फसल खराब होने की स्थिति में उसके सामने कर्ज और आर्थिक नुकसान का खतरा खड़ा है।
बारिश का इंतजार, लेकिन बादलों की बेरुखी ने बढ़ाई चिंता-
खरीफ की खेती के लिए बारिश सबसे बड़ा सहारा है। शाहपुरा क्षेत्र में इस बार अब तक बारिश का वह भरोसा नहीं बन पाया है जिसकी किसानों को उम्मीद थी। कहीं बारिश कम हुई तो कहीं बारिश के बीच लंबे अंतराल ने फसलों को प्रभावित किया। पर्याप्त नमी नहीं मिलने से पौधों की बढ़वार और फसल के विकास पर असर पड़ रहा है।
किसानों का कहना है कि खरीफ फसल में मौसम की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। समय पर बारिश हो तो किसान की मेहनत रंग ला सकती है, लेकिन बारिश का असमान वितरण और लंबे अंतराल खेती का पूरा गणित बिगाड़ देता है।
एक तरफ किसान आसमान की ओर देख रहा है कि कब अच्छी बारिश होगी, दूसरी तरफ खेत में खड़ी फसल बीमारी से पीली पड़ रही है। ऐसे हालात में किसान के लिए हर दिन चिंता का नया कारण लेकर आ रहा है।
बची फसल पर सूअरों का हमला, रात में खेतों में पहरा-
मूंग-उड़द में बीमारी के बीच जिन किसानों की मक्का, ज्वार, बाजरा, तिलहन, मूंगफली और अन्य खरीफ फसलें बची हुई हैं, उनकी परेशानी भी कम नहीं है। खेतों में जंगली सूअरों के झुंड घुसकर फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
किसानों के अनुसार रात के समय सूअरों की आवाजाही अधिक बढ़ जाती है। झुंड खेत में घुसते ही खड़ी फसल को रौंद देता है। कई जगह पौधे टूट जाते हैं और खेत में खड़ी फसल जमीन पर बिखर जाती है।
किसानों का कहना है कि फसल बचाने के लिए उन्हें रात-रातभर खेतों की निगरानी करनी पड़ रही है। एक किसान अकेले कितने खेत की पहरेदारी करे, यह सबसे बड़ी समस्या है। दिनभर खेती का काम और रात में खेत की रखवाली ने किसानों की परेशानी और बढ़ा दी है।
किसानों का कहना है कि एक ओर रोग फसल को कमजोर कर रहा है और दूसरी ओर सूअर बची-खुची फसल को भी निशाना बना रहे हैं। ऐसे में यदि समय रहते प्रशासन ने कदम नहीं उठाए तो नुकसान और बढ़ सकता है।
प्रतापपुरा में सूअरों का आतंक, किसान परेशान-
प्रतापपुरा ग्राम पंचायत क्षेत्र में भी जंगली सूअरों के लगातार हमलों से किसान भारी नुकसान की शिकायत कर रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार पिछले कुछ दिनों से रात के समय सूअरों के झुंड खेतों में घुस रहे हैं और खरीफ की फसलों को बुरी तरह तहस-नहस कर रहे हैं।
प्रभावित किसानों का कहना है कि समस्या लगातार बढ़ रही है। कई बार स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों को सूचना देने के बावजूद अभी तक ऐसी प्रभावी व्यवस्था नहीं बन पाई है, जिससे फसलों को सुरक्षित रखा जा सके।
किसान शंकरलाल गाडरी ने बताया कि उन्होंने कई बार संबंधित अधिकारियों को समस्या से अवगत कराया है। अधिकारियों ने मामले का संज्ञान लिया है, लेकिन अभी तक किसानों को ठोस राहत या बचाव के पर्याप्त साधन नहीं मिल पाए हैं। उन्होंने कृषि विभाग और वन विभाग से मिलकर प्रभावी कार्रवाई करने की मांग की है। साथ ही जंगली सूअरों से बचाव के लिए पकड़ने के उपकरण, मानव हितैषी उपाय और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने की मांग उठाई है।
जीव दया सेवा समिति ने मांगा गांव-गांव सर्वे-
किसानों की समस्या को गंभीरता से लेते हुए जीव दया सेवा समिति ने प्रशासन और कृषि विभाग से तत्काल कार्रवाई की मांग की है। समिति संयोजक अतू खां कायमखानी ने कहा कि शाहपुरा तहसील की सभी ग्राम पंचायतों में फसल की वास्तविक स्थिति का सर्वे कराया जाना चाहिए।
उन्होंने मांग की कि कृषि विभाग की टीमें प्रभावित गांवों और खेतों में पहुंचकर मूंग-उड़द सहित अन्य फसलों का मौका मुआयना करें। फसल खराबी की वास्तविक रिपोर्ट तैयार कर संबंधित बीमा कंपनियों को भेजी जाए, ताकि पात्र किसानों को फसल बीमा क्लेम और नियमानुसार मुआवजा मिल सके।
समिति ने बची हुई फसलों को जंगली सूअरों से हो रहे नुकसान से बचाने के लिए प्रशासन, वन विभाग और कृषि विभाग के बीच समन्वय से प्रभावी व्यवस्था बनाने की भी मांग की है।
इस मांग में पीसीसी सदस्य संदीप महावीर जीनगर, वर्तमान पार्षद डॉ. मोहम्मद इसाक, शंकरलाल जाट, शिवराज जाट, रामप्रसाद, राजूलाल, बंटी बंजारा, बाबूलाल और उगमलाल रेगर सहित अन्य लोगों ने भी किसानों को राहत दिलाने की मांग उठाई है।
कृषि विशेषज्ञ बोले समय पर पहचान और वैज्ञानिक सलाह जरूरी-
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार पीला मोजेक जैसी समस्या में शुरुआती स्तर पर रोग की पहचान बेहद महत्वपूर्ण है। खेत में पत्तियों का पीला पड़ना, पौधों की वृद्धि प्रभावित होना तथा फूल और फलियों का विकास रुकना दिखाई दे तो किसान को तुरंत कृषि विशेषज्ञ या कृषि विभाग से सलाह लेनी चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार किसान बिना सलाह के बार-बार अलग-अलग कीटनाशकों का प्रयोग करने से बचें। खेत की वास्तविक स्थिति के आधार पर ही उपचार किया जाना चाहिए। पर्याप्त नमी और मौसम की स्थिति भी फसल के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बारिश में लंबा अंतराल होने पर कमजोर फसल पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि जंगली सूअरों से फसल बचाने की जिम्मेदारी केवल किसान पर नहीं छोड़ी जा सकती। इसके लिए प्रशासन और संबंधित विभागों को स्थानीय स्तर पर सुरक्षित एवं प्रभावी व्यवस्था करनी होगी।
किसानों की मांग-अब खेत पर पहुंचकर देखे प्रशासन-
शाहपुरा के किसानों की मांग है कि अधिकारियों की टीमें गांव-गांव और खेत-खेत पहुंचकर वास्तविक स्थिति देखें। किसानों का कहना है कि कागजों में सर्वे और मौके पर हुए नुकसान में अंतर नहीं होना चाहिए। जिस किसान की जितनी फसल खराब हुई है, उसका निष्पक्ष आकलन होना जरूरी है।
किसानों ने मांग की है कि मूंग-उड़द में पीला मोजेक से हुए नुकसान का सर्वे कराया जाए, फसल बीमा कंपनियों को रिपोर्ट भेजी जाए और पात्र किसानों को राहत दिलाई जाए। साथ ही जंगली सूअरों से बची हुई फसलों को सुरक्षित रखने के लिए तत्काल ठोस कदम उठाए जाएं। इस समय शाहपुरा का किसान सिर्फ अच्छी बारिश का इंतजार नहीं कर रहा, बल्कि प्रशासन की मदद की भी उम्मीद लगाए बैठा है। बारिश की बेरुखी, फसल पर बीमारी और खेतों में सूअरों का आतंक इन तीनों के बीच किसान की मेहनत दांव पर लगी है।
काश्तकारों का दर्द यही है कि अगर समय रहते सर्वे, राहत और सुरक्षा की व्यवस्था नहीं हुई तो इस खरीफ सीजन का नुकसान आने वाले महीनों तक उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित कर सकता है। खेत में खड़ी फसल किसान के लिए सिर्फ पौधे नहीं, बल्कि उसके परिवार की उम्मीद, बच्चों की जरूरत और पूरे साल की कमाई का सहारा होती है। इसलिए अब जरूरत है कि प्रशासन इस संकट को गंभीरता से ले और किसान की पीड़ा खेत तक पहुंचकर सुने, आंकड़ों में नहीं।