शाहपुरा, मूलचन्द पेसवानी
देश का भविष्य केवल किताबों में नहीं, बल्कि युवाओं की सोच, सवालों और संकल्पों में लिखा जाता है। इसी सोच को केंद्र में रखते हुए सोमवार को शाहपुरा के बारहठ महाविद्यालय में युवा संवाद कार्यक्रम आयोजित हुआ। कार्यक्रम में युवाओं ने देश, शिक्षा, संस्कृति, तकनीक और वर्तमान सामाजिक चुनौतियों से जुड़े सवाल उठाए तो वक्ताओं ने संवाद के माध्यम से समाधान खोजने और तर्कशील सोच विकसित करने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, चित्तौड़ प्रांत के प्रांत कार्यवाह डॉ. शंकर लाल माली रहे। मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. पुष्करराज मीणा, प्राचार्य एवं जिला अध्यक्ष, अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ, भीलवाड़ा उपस्थित रहे। कार्यक्रम शाहपुरा नगर संघचालक कन्हैया लाल की उपस्थिति में आयोजित हुआ।

कार्यक्रम का शुभारंभ मां शारदे और भारत माता के चित्र के समक्ष पुष्पांजलि अर्पित कर तथा सामूहिक वंदे मातरम् के साथ हुआ। इसके बाद युवाओं के साथ संवाद का सिलसिला शुरू हुआ।
‘भारत की सोच सहअस्तित्व की रही है’
युवाओं को संबोधित करते हुए डॉ. शंकर लाल माली ने कहा कि भारत ने प्रारंभ से ही सहअस्तित्व के विचार को स्वीकार किया है। जिस प्रकार प्रकृति में जड़ और चेतन एक-दूसरे के साथ सहअस्तित्व में रहते हैं, उसी प्रकार भारतीय समाज में विभिन्न पीढ़ियां संवाद और परस्पर सहयोग के माध्यम से आगे बढ़ती रही हैं।
उन्होंने कहा कि भारत की सोच केवल साम्राज्य विस्तार तक सीमित नहीं रही, बल्कि ‘संपूर्ण विश्व के कल्याण’ की भावना भारतीय चिंतन का मूल हिस्सा रही है। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और ‘अतिथि देवो भवः’ जैसे संस्कार भारतीय जीवन पद्धति की व्यापकता को दर्शाते हैं।
भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति को सर्वाेच्च सम्मान
डॉ. माली ने भारतीय संस्कृति में मातृशक्ति के सम्मान को रेखांकित करते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में नारी शक्ति को सदैव विशेष स्थान दिया गया है। राधा-कृष्ण, गौरी-शंकर और सीता-राम जैसे उदाहरणों में भी नारी शक्ति का नाम पहले लिया जाना भारतीय संस्कृति में महिला सम्मान की गहरी परंपरा को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय सांस्कृतिक परंपराएं केवल धार्मिक आस्थाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सामाजिक मूल्यों और जीवन जीने की दिशा देने का कार्य करती रही हैं। वेद, पुराण और गीता जैसे ग्रंथों में जीवन के विभिन्न पक्षों को समझने और सही मार्ग चुनने की प्रेरणा मिलती है।
तक्षशिला और नालंदा से लेकर आधुनिक तकनीक तक भारत की यात्रा
युवा संवाद में भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था का भी उल्लेख हुआ। डॉ. माली ने कहा कि भारत प्राचीनकाल से ही ज्ञान और शिक्षा का बड़ा केंद्र रहा है। तक्षशिला, नालंदा और ओदंतपुरी जैसे शिक्षा केंद्रों में देश-विदेश से विद्यार्थी और विद्वान अध्ययन के लिए आते थे।
उन्होंने युवाओं से कहा कि आज भारत के सामने अपनी गौरवशाली ज्ञान परंपरा को आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक के साथ जोड़ने की बड़ी चुनौती है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में विज्ञान और तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है और इस क्षेत्र में युवाओं को निर्णायक भूमिका निभानी होगी।
‘सोशल मीडिया के हर विमर्श को सच मत मानो’
युवाओं को सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी सचेत किया गया। डॉ. माली ने कहा कि सोशल मीडिया पर कई बार युवाओं को भ्रमित करने और दूषित विमर्श की ओर ले जाने वाली गतिविधियां सामने आती हैं। ऐसे में युवाओं को किसी भी जानकारी को आंख मूंदकर स्वीकार करने के बजाय तर्कशील सोच विकसित करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि युवा किसी भी विषय पर निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले तथ्यों को समझें, सवाल करें और उसके विभिन्न पक्षों का विश्लेषण करें। यही जागरूक नागरिक और जिम्मेदार युवा की पहचान है।
2047 का विकसित भारत युवाओं के कंधों पर
डॉ. माली ने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत का सपना साकार करने में युवा शक्ति की सबसे बड़ी भूमिका होगी। विज्ञान, तकनीक, नवाचार और उद्यमिता के क्षेत्र में युवा आगे आएं और अपनी प्रतिभा को राष्ट्र निर्माण से जोड़ें। उन्होंने कहा कि देश के सामने मौजूद समस्याओं का समाधान संवाद के माध्यम से तलाशना चाहिए। आंदोलन या उग्र आंदोलन कई बार राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के साथ सामाजिक और राजनीतिक वैमनस्य को भी जन्म देते हैं। इसलिए युवाओं को अपनी बात मजबूती से रखने के साथ-साथ लोकतांत्रिक और रचनात्मक संवाद की राह अपनानी चाहिए।
संघ के शताब्दी वर्ष में युवा संवाद अहम पहल
मुख्य वक्ता ने बताया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में विभिन्न सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में युवा संवाद एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसका उद्देश्य युवाओं से सीधे संवाद स्थापित करना और उनके विचारों, जिज्ञासाओं तथा समस्याओं को समझना है।
युवाओं ने बेबाकी से पूछे सवाल
कार्यक्रम की खासियत यह रही कि विद्यार्थियों ने केवल भाषण सुनने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि अपनी जिज्ञासाओं को खुलकर सामने रखा। युवाओं ने पारंपरिक ज्ञान, शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा प्रणाली से जुड़े सवाल उठाए।
विद्यार्थियों ने पूछा कि हमारे पारंपरिक ज्ञान को पाठ्यसामग्री का हिस्सा क्यों नहीं बनाया जा रहा है? स्कूलों और महाविद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए नियमित काउंसलिंग की व्यवस्था क्यों नहीं है, जबकि युवा अवस्था में मार्गदर्शन और मानसिक सहयोग की जरूरत सबसे अधिक होती है? इसी तरह विद्यार्थियों ने परीक्षा व्यवस्था में प्रश्नपत्र लीक जैसी गंभीर समस्याओं पर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि ऐसी अनियमितताओं को रोकने के लिए कंप्यूटर आधारित परीक्षा प्रणाली को व्यापक स्तर पर क्यों नहीं अपनाया जाता।
इन सवालों ने कार्यक्रम को एकतरफा भाषण के बजाय वास्तविक अर्थों में संवाद का रूप दिया। विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान करने के साथ उन्हें अपनी समस्याओं और विचारों को लोकतांत्रिक तरीके से सामने रखने के लिए प्रेरित किया गया।
200 से अधिक युवाओं की भागीदारी
मुख्य अतिथि डॉ. पुष्करराज मीणा ने युवा संवाद कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए युवाओं की सक्रिय भागीदारी को महत्वपूर्ण बताया। कार्यक्रम में अनेक गणमान्य नागरिक, शिक्षाविद्, सामाजिक कार्यकर्ता एवं 200 से अधिक युवाओं ने भाग लिया।
