राम कथा मनुष्यों को संयम, संस्कार और कर्तव्य पालन की प्रेरणा देती है – महामंडलेश्वर स्वामी जगदीश दास
-राम जानकी विवाह प्रसंग पर झूमे श्रद्धालु
भीलवाड़ा, 22 मई।
सनातन सेवा समिति के तत्वावधान एवं महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम जी उदासीन के सानिध्य में हरी शेवा उदासीन आश्रम सनातन मंदिर में अधिकमास के अवसर पर चल रहे सेवा-सुमिरन प्रकल्प एवं पुरुषोत्तम माह महोत्सव में बह रही धर्म त्रिवेणी के अंतर्गत आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा के छठे दिवस हरिद्वार के महामंडलेश्वर स्वामी जगदीश दास उदासीन ने व्यासपीठ से भगवान श्रीराम एवं माता सीता के दिव्य विवाह प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा श्रवण कर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे तथा पूरा वातावरण “सीताराम” और “जय श्रीराम” के जयघोषों से भक्तिमय हो गया। महामंडलेश्वर जगदीश दास ने कहा कि भगवान श्रीराम और माता सीता का विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा, प्रेम, त्याग और आदर्शों का दिव्य संगम है। रामकथा मानव जीवन को संयम, संस्कार एवं कर्तव्य पालन की प्रेरणा देती है। उन्होंने कहा कि जहां राम हैं वहां धर्म है और जहां धर्म है वहीं सुख, शांति और सद्भाव का वास होता है।
महामंडलेश्वर जगदीश दास उदासीन ने बताया कि महर्षि विश्वामित्र जब राजा दशरथ के दरबार में पहुंचे और अपने यज्ञ की रक्षा हेतु श्रीराम एवं लक्ष्मण को साथ ले जाने का आग्रह किया, तब गुरु वशिष्ठ के समझाने पर राजा दशरथ ने दोनों राजकुमारों को उनके साथ भेजा। वन में श्रीराम ने ताड़का वध कर तथा मारीच और सुबाहु को परास्त कर ऋषियों के यज्ञ की रक्षा की और धर्म की स्थापना की।
महामंडलेश्वर ने कहा कि गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या श्रापवश पत्थर शीला बन गई थीं, जिनका भगवान श्रीराम के चरण स्पर्श से उद्धार हुआ। यह प्रसंग भगवान की करुणा एवं कृपा का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि भगवान का स्वभाव औषधालय का प्रतीक है जो भी संपर्क में जाता है उसकी गति सुधर जाती है। इसके पश्चात महर्षि विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को लेकर जनकपुरी पहुंचे, जहां राजा जनक ने माता सीता के स्वयंवर का आयोजन किया था। महामंडलेश्वर जगदीश दास जी महाराज ने पुष्प वाटिका प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि जनकपुरी में श्रीराम और सीता ने पहली बार एक-दूसरे के दर्शन किए। माता सीता ने मन ही मन श्रीराम को पति रूप में स्वीकार कर माता गौरी से प्रार्थना की। स्वयंवर सभा में अनेक राजा-महाराजा भगवान शिव के दिव्य धनुष को हिला तक नहीं सके, लेकिन गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से भगवान श्रीराम ने सहज भाव से धनुष उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाई और धनुष भंग हो गया। सम्पूर्ण सभा “जय श्रीराम” के उद्घोष से गूंज उठी। इसके बाद राजा जनक ने अत्यंत प्रसन्न होकर माता सीता का विवाह भगवान श्रीराम से करने का निर्णय लिया। महामंडलेश्वर जगदीश दास उदासीन ने कहा कि वर्तमान समय में परिवारों में संस्कार, आपसी प्रेम और मर्यादा बनाए रखने के लिए रामचरितमानस के आदर्शों को जीवन में अपनाना आवश्यक है। भगवान श्रीराम का चरित्र त्याग, सेवा, विनम्रता एवं मर्यादा का संदेश देता है। कथा के समापन पर महाआरती आयोजित हुई तथा श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया। आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु, मातृशक्ति एवं युवा उपस्थित रहे। आज विष्णु यज्ञ एवं रुद्राभिषेक में महेश मोरियानी व धर्मपत्नी सहित माता जी ने जोड़े सहित आहुतियाँ दी और महादेव का अभिषेक किया।
पुरुषोत्तम माह महोत्सव के अंतर्गत आश्रम में प्रतिदिन विष्णु यज्ञ, रुद्राभिषेक, संकीर्तन, गंगा आरती एवं विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हो रहे हैं। आश्रम के संत मायाराम और संत गोविन्दराम ने सनातन धर्म के सभी श्रद्धालुओं से पुरुषोत्तम मास में भीलवाड़ा में बह रही धर्मगंगा की त्रिवेणी का लाभ लेने का आग्रह किया है।
