तपस्वियों की साधना को मिला युवाचार्यश्री का मंगलाशीष, साध्वीवृंद की तपस्या की पूछी सुखसाता
*पुनित चपलोत*
भीलवाड़ा // सत्य कोई केवल बोलने योग्य शब्द नहीं, बल्कि जीने योग्य जीवन-दृष्टि है। क्योंकि सत्य ही भगवान है। सत्य की खोज विज्ञान से लेकर दर्शन तक की मूल प्रेरणा रही है। वैज्ञानिक भौतिक जगत के रहस्यों में सत्य तलाशता है तो दार्शनिक आध्यात्मिक जगत में उसकी खोज करता है। आगमों और ग्रंथों ने इस खोज को एक गहरी परिणति देते हुए कहा है ‘सच्चं खलु भगवं’, अर्थात सत्य ही भगवान है। यह बात शांतिभवन में चातुर्मासार्थ विराजित श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने आयोजित विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त की।

युवाचार्यश्री ने कहा कि सत्य क्या है? प्रश्न सरल है, लेकिन उसका उत्तर उतना ही गहरा है। विज्ञान भौतिक जगत में सत्य की खोज करता है तो दर्शन आध्यात्मिक जगत में। खोज के क्षेत्र अलग हैं, लेकिन जिज्ञासा एक ही है सत्य की पहचान। आगमों ने सत्य को भगवान कहा है। ‘भग’ ज्ञान, ऐश्वर्य, सामर्थ्य और विशुद्धता का बोध कराता है। सत्य में यही वास्तविक ऐश्वर्य निहित है। सत्य को जान लेना ही पर्याप्त नहीं, उसका जीवन में प्रकट होना ही उसकी वास्तविक उपलब्धि है।
स्थानांग सूत्र में सत्य के चार स्वरूपों का उल्लेख इसी जीवन-सत्य को समझने का मार्ग दिखाता है। काया की ऋजुता शरीर को केवल सीधा रखने का नाम नहीं, बल्कि उसकी हर गतिविधि में सामंजस्य और यत्न का भाव है। आंखें जिस दिशा में देखें, कदम उसी अनुरूप उठें। चलने, बैठने, खड़े होने, सोने और भोजन करने तक प्रत्येक क्रिया में सजगता हो। जैन दर्शन की ईर्या समिति इसी यत्नपूर्ण जीवन का व्यवहारिक स्वरूप है ऐसी गति, जिसमें स्वयं को अनावश्यक कष्ट न पहुंचे और किसी जीव के प्रति प्रमाद न हो। एक समय में एक कार्य को पूरी एकाग्रता से करना भी इसी सजगता का हिस्सा है।

शरीर की ऋजुता व्यक्ति के व्यक्तित्व की मौन भाषा भी है। उसका बैठना, चलना और खड़ा होना भीतर की स्थिति को प्रकट करता है। मन के स्तर पर भी यही सजगता चाहिए। चिंता व्यर्थ है, चिंतन सार्थक। चिंताओं का बोझ लेकर विश्राम करने वाला व्यक्ति शरीर को आराम दे सकता है, मन को नहीं। भोजन भी सजगता से हो।
सत्य की दूसरी अभिव्यक्ति भाषा की ऋजुता में है। वाणी छल, कपट और भ्रम की प्रवृत्ति से मुक्त हो। शब्दों की बाजीगरी से किसी को प्रभावित किया जा सकता है, लेकिन विश्वास अर्जित नहीं किया जा सकता। भाषा में स्पष्टता के साथ मधुरता,हितभाव और संवेदना हो। वाणी की सार्थकता उसके प्रभाव में नहीं, उसकी निष्कपटता में है।
उन्होंने कहा कि भावों की ऋजुता सत्य की सबसे गहरी भूमि है। मन में सरलता, निष्कपटता और निरागसता हो तो सत्य केवल कथन नहीं रहता, जीवन का अनुभव बन जाता है। गौतम स्वामी का भगवान महावीर के समक्ष सहज समर्पण इसी भाव-सरलता का उदाहरण है। ज्ञान की ऊंचाई तभी सार्थक होती है, जब उसके साथ मन की निर्मलता भी जुड़ी हो।
युवाचार्यश्री ने कहा कि सत्य की पूर्णता मन, वचन और कर्म की एकरूपता में है। चित्त में कुछ और, वाणी में कुछ और तथा आचरण में कुछ और हो तो सत्य जीवन में अधूरा रह जाता है। जैसा मन हो, वैसी वाणी और जैसी वाणी हो, वैसा कर्म यही ऋजुता चरित्र को विश्वसनीय बनाती है।
उन्होंने कहा कि विज्ञान सत्य को खोजता है, दर्शन उसके स्वरूप को समझने का प्रयास करता है और साधना उसे जीवन में उतारती है। काया में सजगता, भाषा में निष्कपटता और भावों में निर्मलता जब मन, वचन और कर्म की एकरूपता में बदलती है, तब सत्य बाहर खोजने की वस्तु नहीं रहता, वह जीवन में प्रकट होने लगता है।
इस दौरान युवाचार्यश्री ने तपस्या में रत साधकों एवं आगामी तप आराधना के लिए आगे बढ़ रहे तपस्वियों को प्रत्याख्यान करवाए। साध्वी प्रतिभाजी, महासती पीयूषदर्शनाजी,साध्वी काव्याश्री सहित साध्वीवृंद की तपस्या की सुखसाता पूछते हुए उन्होंने मंगलकामनाएं प्रेषित कीं। इसी अवसर पर श्रेणीक चारित्र का भी शुभारंभ किया।
धर्मसभा में चेन्नई, महाराष्ट्र, गुजरात सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं के साथ भीलवाड़ा शहर के विभिन्न श्रीसंघों एवं उपनगरों से बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।
शांतिभवन श्रीसंघ के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद चीपड़ एवं मंत्री नवरतनमल भलावल ने बताया कि रविवार को विशेष प्रवचन के साथ युवाचार्यश्री के सान्निध्य में दोपहर में 12 से 21 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों के लिए ‘मन की बात’ संवाद एवं ‘आनंद बाल शिविर’ आयोजित किया जाएगा। इसी के साथ सिद्धि तप की आराधना का शुभारंभ होगा।
