रामनिवास धाम में भागवत कथा के तीसरे दिन ध्रुव चरित्र का भावपूर्ण विवेचन, 21 सितंबर को मनाया जाएगा कृष्ण जन्मोत्सव
शाहपुरा। मूलचन्द पेसवानी।
श्रीमद्भागवत कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि जीवन को संस्कार, भक्ति और सही दिशा देने वाली ज्ञानधारा है। कथा के तीसरे दिन रामनिवास धाम की बारादरी में संत मस्तरामजी महाराज ने ध्रुव चरित्र का भावपूर्ण विवेचन करते हुए कहा कि संसार में मां ही अपनी संतान को सबसे पहले शिक्षा और संस्कार देने वाली गुरु होती है। यदि सुनीति जैसी मां और ध्रुव जैसा पुत्र हो तो भक्ति के मार्ग पर चलकर परमात्मा की प्राप्ति संभव है।
संत मस्तरामजी महाराज ने ध्रुव चरित्र के प्रसंग के माध्यम से कहा कि बाल्यावस्था से ही मिलने वाले संस्कार व्यक्ति के जीवन की दिशा तय करते हैं। मां अपने व्यवहार, वाणी और संस्कारों से संतान के व्यक्तित्व का निर्माण कर सकती है। ध्रुव को उनकी माता सुनीति ने सत्य, धर्म और परमात्मा की ओर बढ़ने की प्रेरणा दी। यही संस्कार आगे चलकर ध्रुव की अटूट भक्ति और तपस्या का आधार बने।
उन्होंने कहा कि ध्रुव ने तपस्या पर जाने से पहले अपनी मां की आज्ञा ली। मां की अनुमति और आशीर्वाद लेकर शुरू की गई उनकी साधना सफल हुई। इससे यह संदेश मिलता है कि बालक जब किसी शुभ कार्य को शुरू करने से पहले माता-पिता की आज्ञा और आशीर्वाद प्राप्त करता है तो उसके भीतर आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
संत मस्तरामजी महाराज ने कहा कि आज के समय में बच्चों को केवल किताबी शिक्षा देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें परिवार, समाज और संत परंपरा से जुड़े संस्कार देना भी उतना ही आवश्यक है। माता-पिता बच्चों के प्रथम शिक्षक हैं और उनके आचरण का प्रभाव बच्चों के जीवन पर गहराई से पड़ता है। संस्कारित परिवार ही संस्कारित समाज की नींव तैयार करता है।
कथा के दौरान ध्रुव की तपस्या और परमात्मा की प्राप्ति के प्रसंग का भी विस्तार से वर्णन किया गया। श्रद्धालुओं ने कथा का भावपूर्वक श्रवण किया।
21 सितंबर को कृष्ण जन्मोत्सव
रामनिवास धाम के कार्यवाहक भंडारी संत नवनिधरामजी महाराज ने बताया कि कथा आयोजन के क्रम में 21 सितंबर को अपराह्न काल में कृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाएगा। इस अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्म प्रसंग का कथा के माध्यम से भावपूर्ण वर्णन होगा।
उन्होंने शाहपुरा सहित आसपास के क्षेत्र के श्रद्धालुओं और रामस्नेही सत्संगीजनों से कथा में अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर आध्यात्मिक लाभ लेने का आह्वान किया। रामस्नेही संप्रदाय की मर्यादाओं के अनुरूप आयोजित हो रही इस कथा में भक्ति के साथ संस्कार, सदाचार और जीवन मूल्यों पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
