BHILWARA

*विकास की वेदी पर बलि चढ़ते जल, जंगल और जमीन; विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष ग्राउंड रिपोर्ट*



*विशेष रिपोर्ट — सत्यनारायण सेन*

गुरला/भीलवाड़ा: आज पूरा विश्व पर्यावरण दिवस मना रहा है, लेकिन विकास की आधुनिक और अंधी दौड़ ने हमारे अस्तित्व के तीन सबसे बड़े आधारों—जल, जंगल और जमीन—को विनाश की कगार पर धकेल दिया है। औद्योगिक प्रगति और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के निर्माण के नाम पर प्रकृति का जो दोहन हो रहा है, उसने मानव जीवन के सामने ही संकट खड़ा कर दिया है।



*फैक्ट्रियों का जहर उगलती नदियां और अतिक्रमण की मार*

देश की जीवनदायिनी नदियां और पारंपरिक तालाब अब नालों में तब्दील हो रहे हैं। औद्योगिक क्षेत्रों (Industrial Zones) से निकलने वाला रासायनिक और गंदा पानी बिना ट्रीटमेंट के सीधे नदियों में प्रवाहित किया जा रहा है। इसके साथ ही, शहरों और गांवों में जल स्रोतों, तालाबों और प्राकृतिक नालों पर भू-माफियाओं द्वारा धड़ल्ले से अवैध अतिक्रमण किया जा रहा है, जिससे बारिश के पानी का संचयन पूरी तरह ठप हो चुका है।

*कंक्रीट के जंगलों के लिए कटते हरे पेड़*

विकास के नाम पर हाईवे, रेलवे लाइन और बहुमंजिला इमारतों के लिए लाखों जंगलों को साफ किया जा रहा है। डराने वाली बात यह है कि अब जंगलों के साथ-साथ किसानों के खेतों की मेड़ों से भी पेड़ गायब हो रहे हैं। मवेशियों के लिए आरक्षित चरागाह भूमियों (Pasture Lands) पर लगातार अवैध कब्जे हो रहे हैं, जिससे ग्रामीण पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) पूरी तरह बिगड़ चुका है।

*अवैध खनन से खोखली होती जमीन*

नदियों के सीने को चीरकर निकाला जा रहा अवैध बालू (बजरी) और पहाड़ों को डायनामाइट से उड़ाकर किया जा रहा पत्थर का खनन जमीन को अंदर से खोखला कर रहा है। कानून को ताक पर रखकर भू-माफिया पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचा रहे हैं। इसके साथ ही, सिंगल-यूज प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग जमीन की उपजाऊ क्षमता को हमेशा के लिए दफन कर रहा है।

*समय रहते नहीं संभले तो भुगतने होंगे गंभीर परिणाम*

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल प्रदूषण, अंधाधुंध वनों की कटाई और अवैध खनन पर तुरंत कड़े कानून बनाकर रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध हवा और पीने के पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसना पड़ेगा। प्लास्टिक मुक्त समाज और हर नागरिक द्वारा वृक्षारोपण ही अब इस तबाही को रोक सकता है।

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