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दो से अधिक संतान वालों पर चुनावी पाबंदी खत्म, 30 साल बाद बदलेगा स्थानीय सियासत का समीकरण


जयपुर। प्रदेश की स्थानीय राजनीति में तीन दशक बाद बड़ा बदलाव होने जा रहा है। राज्य सरकार ने दो से अधिक संतान वाले व्यक्तियों के पंचायतीराज और शहरी निकाय चुनाव लड़ने पर लगी रोक हटाने का निर्णय लिया है। कैबिनेट बैठक में राजस्थान पंचायतीराज (संशोधन) विधेयक और राजस्थान नगरपालिका (संशोधन) विधेयक 2026 को मंजूरी दे दी गई है। सरकार का कहना है कि बदले सामाजिक और जनसांख्यिकीय हालात को देखते हुए यह फैसला लिया गया है, जिससे अब दो से अधिक बच्चों वाले भी पंचायत और निकाय चुनावों में अपनी दावेदारी पेश कर सकेंगे।

कानून मंत्री जोगाराम पटेल ने कैबिनेट के निर्णय की जानकारी देते हुए बताया कि दोनों संशोधन विधेयक वर्तमान सत्र में ही पारित किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि जब यह प्रावधान लागू किया गया था, तब जनसंख्या नियंत्रण एक प्रमुख नीति उद्देश्य था, लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदल चुकी हैं और अब इस प्रावधान की प्रासंगिकता पर पुनर्विचार आवश्यक हो गया था।



1995 में लागू हुआ था दो-संतान नियम

गौरतलब है कि वर्ष 1995 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व वाली सरकार ने पंचायतीराज और नगरपालिका कानूनों में संशोधन कर यह प्रावधान जोड़ा था। इसके तहत दो से अधिक संतान वाले व्यक्ति को स्थानीय निकाय और पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया गया था। उस समय इसे जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में एक कड़ा लेकिन आवश्यक कदम माना गया था।

करीब 30 वर्ष बाद अब उसी प्रावधान को समाप्त करने का निर्णय लिया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बदलाव से जमीनी स्तर की राजनीति में नए समीकरण बनेंगे और कई ऐसे नेता, जो अब तक केवल दो से अधिक बच्चों की शर्त के कारण चुनावी मैदान से बाहर थे, उन्हें सक्रिय राजनीति में लौटने का अवसर मिलेगा।

स्थानीय राजनीति में दिखेगा असर

प्रदेश के कई जिलों में विभिन्न राजनीतिक दलों के ऐसे संभावित उम्मीदवार मौजूद हैं, जो दो-संतान नियम के कारण चुनाव नहीं लड़ पा रहे थे। पाबंदी हटने के बाद भाजपा और कांग्रेस सहित अन्य दलों को नए चेहरों को मौका देने का अवसर मिलेगा। इससे पंचायत, नगर परिषद और नगर पालिकाओं के चुनावों में प्रतिस्पर्धा और बढ़ने की संभावना है।

राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि इस निर्णय से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में नेतृत्व का दायरा विस्तृत होगा। सरकार का तर्क है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी का अधिकार व्यापक होना चाहिए और व्यक्तिगत पारिवारिक स्थिति को चुनावी पात्रता से जोड़ना अब उचित नहीं है।



विधानसभा सत्र में होगी औपचारिक मंजूरी

कैबिनेट की स्वीकृति के बाद अब दोनों संशोधन विधेयक विधानसभा में पेश किए जाएंगे। सदन से पारित होने के बाद ये प्रावधान लागू हो जाएंगे और आगामी निकाय व पंचायतीराज चुनावों में नए नियम प्रभावी होंगे।

करीब तीन दशक पुराने फैसले में यह बदलाव प्रदेश की स्थानीय सियासत में एक नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है।

KAPIL SHYAM VIJAY

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