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शाहपुरा का आईना-प्रतापसिंह बारहठ की जयंती- “क्या हम अपने शहीदों के सचमुच वारिस हैं ?”त्रिमूर्ति स्मारक पर सन्नाटा और दिलों में उदासीनता, क्या यही है शहीदों के प्रति हमारा सम्मान ?



शाहपुरा-मूलचन्द पेसवानी
शाहपुरा की मिट्टी में इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं, सांसों में बसता है। यहां की हवाओं में बलिदान की गूंज है, यहां की गलियों में क्रांति की खुशबू है। इसी धरती ने एक ऐसा लाल जन्मा था, जिसने अपनी जवानी मातृभूमि के चरणों में अर्पित कर दी। नाम था कुंवर प्रताप सिंह बारहठ।


रविवार को शाहपुरा में उनकी 133वीं जयंती मनीयी। पूरे देश ने उनके त्याग, साहस और राष्ट्रभक्ति को नमन किया। गुजरात के द्वारका जिले के खंभालिया में राष्ट्रीय स्तर पर “अमर शहीद कुंवर प्रताप सिंह बारहठ वंदना कार्यक्रम” आयोजित हुआ। जयपुर, कैकड़ी में व्यापक स्तर पर समारोह हुए। देश के कोने-कोने में उन्हें याद कर किया। लेकिन सवाल यह है कि जिस शाहपुरा ने उन्हें जन्म दिया, क्या वह अपने इस सपूत के प्रति अपना कर्तव्य निभा पा रहा है?
यह प्रश्न इसलिए भी जरूरी है क्योंकि शाहपुरा में प्रताप सिंह बारहठ की स्मृतियों की कोई कमी नहीं है। यहां त्रिमूर्ति स्मारक है, राष्ट्रीय बारहठ संग्रहालय है, उनकी माताजी के नाम पर बालिका विद्यालय है, उनके नाम पर राजकीय पीजी कॉलेज है। हर पत्थर, हर दीवार, हर स्मारक यह बताता है कि यह शहर किसी साधारण व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक अमर क्रांतिकारी का जन्मस्थान है।
लेकिन विडंबना देखिए, जयंती के अवसर पर त्रिमूर्ति स्मारक पर कार्यक्रम हुआ, श्रद्धांजलि भी दी गई, माल्यार्पण भी हुआ, भाषण भी हुए। मगर वहां मौजूद लोगों की संख्या क्या थी? मात्र 18।
जी हां, लगभग 30 हजार की आबादी वाले शाहपुरा में केवल 18 लोग अपने शहीद को याद करने पहुंचे। यह आंकड़ा सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि हमारी संवेदनहीनता का आईना है। यह बताता है कि हम धीरे-धीरे अपने इतिहास से कटते जा रहे हैं।
सोचिए, अगर इसी स्थान पर कोई भजन संध्या होती, कोई डीजे नाइट होती, कोई राजनीतिक सभा होती या कोई मनोरंजन कार्यक्रम होता, तो क्या वहां सिर्फ 18 लोग होते? शायद नहीं। वहां भीड़ उमड़ पड़ती, कुर्सियां कम पड़ जातीं, सोशल मीडिया पर फोटो और वीडियो की भरमार हो जाती। लेकिन जब बात एक ऐसे क्रांतिकारी की आती है जिसने देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, तब हम चुप क्यों हो जाते हैं?
क्या राष्ट्रभक्ति अब सिर्फ सोशल मीडिया स्टेटस तक सीमित रह गई है? क्या शहीदों को याद करना अब केवल सरकारी औपचारिकता बनकर रह गया है?
सबसे पीड़ादायक बात तो यह रही कि बारहठ परिवार के नाम पर चल रही संस्थाओं के कई पदाधिकारी भी कार्यक्रम में नजर नहीं आए। यह अनुपस्थिति केवल व्यक्तियों की अनुपस्थिति नहीं थी, बल्कि उस भाव की अनुपस्थिति थी जो किसी समाज को अपने इतिहास से जोड़कर रखती है।
अपने जीवन में क्रांतिकारी कुंवर प्रताप सिंह बारहठ ने कहा था “मैं अपनी एक मां को हंसाने के लिए देश की हजारों माताओं को नहीं रुला सकता।” यह कोई सामान्य वाक्य नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्म का सर्वोच्च संदेश था। एक बेटा अपनी मां के आंसुओं से ऊपर देश की माताओं के दर्द को रखता है, तब जाकर इतिहास उसे अमर बनाता है। लेकिन अफसोस कि उसी शहीद की जयंती पर शाहपुरा की चुप्पी कई सवाल छोड़ गई।
क्या हमारे बच्चों को पता है कि प्रताप सिंह बारहठ कौन थे? क्या स्कूलों में उनके विचारों पर चर्चा होती है? क्या युवा पीढ़ी उनके जीवन से प्रेरणा ले रही है? अगर नहीं, तो यह चिंता सिर्फ एक कार्यक्रम की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की है।
आज जरूरत केवल माल्यार्पण की नहीं है। जरूरत है कि प्रताप सिंह बारहठ को घर-घर तक पहुंचाया जाए। स्कूलों में उनके जीवन पर प्रतियोगिताएं हों, युवाओं के बीच व्याख्यान हों, शहर में विशाल स्तर पर जयंती मनाई जाए। जिस तरह अन्य शहर अपने महापुरुषों पर गर्व करते हैं, उसी तरह शाहपुरा को भी अपने इस अमर सपूत पर गर्व दिखाना होगा। क्योंकि इतिहास केवल स्मारकों से जीवित नहीं रहता, इतिहास लोगों की स्मृतियों और सम्मान से जीवित रहता है।
अगर शाहपुरा अपने शहीदों को भूल गया, तो आने वाली पीढ़ियां शाहपुरा को भूल जाएंगी। जिस शहर ने देश को प्रताप सिंह बारहठ जैसा क्रांतिकारी दिया, उस शहर की पहचान केवल बाजारों और राजनीति से नहीं, बल्कि अपने बलिदानियों के सम्मान से होनी चाहिए।
बड़ा सवाल यही है कि इस जयंती पर 18 लोग नहीं, पूरा शाहपुरा होना चाहिए था। हर घर में दीप जलना चाहिए था। हर बच्चे की जुबान पर प्रताप सिंह बारहठ का नाम होना चाहिए था। क्योंकि शहीद केवल इतिहास के पन्ने नहीं होते, वे किसी शहर की आत्मा होते हैं। और आत्मा की उपेक्षा कभी शुभ संकेत नहीं होती।

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