BHILWARA

चातुर्मास के प्रारंभ पर शांतिभवन में तप आराधना का विराट स्वरूप, 300 से अधिक तपस्वियों ने युवाचार्यश्री से लिए प्रत्याख्यान



तप आत्मशुद्धि और सकाम कर्मनिर्जरा की साधना है : युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी

*पुनित चपलोत*
भीलवाड़ा // तप आत्मशुद्धि और सकाम कर्मनिर्जरा की साधना है। आत्मा पर अनादिकाल से संचित कर्मों के मैल को दूर कर उसे निर्मल बनाने का प्रभावी साधन तप है। तपस्या में आने वाली वेदना को समभावपूर्वक सहन करते हुए कर्मों का क्षय करना ही तप का वास्तविक प्रयोजन है। यह उद्बोधन श्रमण संघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी महाराज ने शांतिभवन में आयोजित विशाल धर्मसभा में धर्मचक्र तप की आराधना कर रहे 300 से अधिक तपस्वी भाई-बहनों की तपस्या की अनुमोदना करते हुए व्यक्त किए।


      उन्होंने कहा कि तपस्या किसलिए है, क्यों की जाती है और तप का वास्तविक उद्देश्य  केवल भोजन के त्याग में नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और कर्मनिर्जरा में निहित है। जैसे किसी स्थान की गंदगी दूर करने के लिए उसे साफ करना पड़ता है, वैसे ही आत्मा पर जन्म -जन्मांतर से संचित कर्मों के मैल को दूर करने के लिए तप आवश्यक है। तपस्या का मूल्य इस बात से नहीं आंका जा सकता कि साधक ने कितने दिन भोजन का त्याग किया, बल्कि इससे कि उस तप के दौरान उसने अपने भीतर कितनी समता, संयम और आत्मजागरण विकसित किया।
  आगम में निर्जरा के चार स्वरूपों का उल्लेख करते हुए युवाचार्यश्री ने कहा कि वेदना और निर्जरा का संबंध समझना आवश्यक है। वेदना कष्ट को सहन करने की स्थिति है, जबकि निर्जरा आत्मा पर बंधे कर्मों के क्षय का नाम है। इसलिए केवल कष्ट सह लेना ही तप की पूर्णता नहीं है; कष्ट के बीच मन की समता और कर्मों के क्षय की दिशा में साधना ही तप को सार्थक बनाती है।
                युवाचार्यश्री ने कहा कि महापुरुषों ने वेदना के बीच भी समता नहीं छोड़ी। उनके लिए वेदना केवल सहन करने की वस्तु नहीं, बल्कि संचित कर्मों के क्षय का अवसर थी। यही महा वेदना-महा निर्जरा का स्वरूप है। इसके विपरीत जहां कष्ट तो बहुत हो, लेकिन मन में द्वेष, प्रतिशोध और अशांति बनी रहे, वहां कर्मों की निर्जरा अल्प होती है। तप की वास्तविक शक्ति शरीर की पीड़ा में नहीं, बल्कि उस पीड़ा के प्रति साधक की दृष्टि में निहित है।
      उन्होंने कहा कि कर्म सिद्धांत में चमत्कार का कोई स्थान नहीं है। कर्मों का क्षय किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि साधना, समता और पुरुषार्थ से होता है। कष्ट आने पर भय, चिंता और हाय-हाय करने से वेदना कम नहीं होती, बल्कि मन नए कर्मों के बंध का कारण बन जाता है। इसके विपरीत समभाव से सहन की गई वेदना कर्मनिर्जरा का माध्यम बनती है।
और यही सिद्धांत जीवन के व्यवहार में भी लागू होता है। जहां मनुष्य दूसरों को दुख देने, प्रतिशोध लेने और एक-दूसरे की पीड़ा बढ़ाने में लगा रहता है, वहां जीवन स्वयं नरक के समान बन जाता है। धर्म मनुष्य को दूसरों के दुख का कारण बनने की नहीं, बल्कि सबके मंगल और सुख की भावना रखने की प्रेरणा देता है। दूसरों को पीड़ा देकर स्वयं सुखी होने का प्रयास अंततः अपने ही कर्मबंधन को मजबूत करता है।
      युवाचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि तप केवल उपवास या आहार त्याग तक सीमित नहीं है। यह मनुष्य की अनादिकालीन आहार, भय, मैथुन और परिग्रह की संज्ञाओं पर विजय पाने की साधना भी है। शरीर उपवास में हो और मन निरंतर भोजन, पारणे या विषयों के चिंतन में लगा रहे तो तप का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। तप तब सार्थक होता है, जब शरीर के साथ मन भी त्याग और संयम में स्थिर रहे।
                      उन्होंने कहा कि तप का उद्देश्य यश, प्रदर्शन या किसी सांसारिक उपलब्धि की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि,कर्मनिर्जरा और आत्म कल्याण है। तपस्या बाहरी प्रदर्शन नहीं, भीतर की यात्रा है। तप के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर संचित कर्मों के पुंज को क्षीण करते हुए आत्मा को मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ता है।
                धर्मसभा में महासती मधुकंवरजी, उपप्रवर्तिनी दिव्यज्योतिजी,महासाध्वी सुचेता जी, विदुषी प्रियुदर्शना जी सहित 19 साधु- साध्वीवृंद का सानिध्य रहा। शांतिभवन आनंद अनुभूति चातुर्मास के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद चीपड़ एवं शांतिजैन महिला मंडल की अध्यक्षा सिम्मी पोखरना ने बताया कि धर्मचक्र तप के अंतर्गत 300 से अधिक तपस्वी भाई-बहनों ने सामूहिक रूप से दो उपवास के प्रत्याख्यान युवाचार्यश्री से ग्रहण किए। बुधवार को तीन उपवास की आराधना तथा गुरुवार को सभी तपस्वियों के सामूहिक पारणे शांतिभवन में रखे गए हैं।

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