राष्ट्रपति भवन में गूंजी शाहपुरा की फड़ कला, तीन कलाकारों ने बढ़ाया शहर का गौरव

शांतिलाल, विजय और विवेक जोशी ने राष्ट्रपति भवन में प्रस्तुत की शाहपुरा की समृद्ध फड़ परंपरा
लोककला को नई पीढ़ी और समकालीन भारत से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम, शाहपुरा संवाद बनेगा परंपरा और समाज के बीच सेतु
शाहपुरा। मूलचन्द पेसवानी
राजस्थान की लोक एवं पारंपरिक कलाओं की दुनिया में शाहपुरा की फड़ चित्रकला की अपनी विशिष्ट पहचान है। यह केवल रंगों और रेखाओं में सजी कोई चित्रशैली नहीं, बल्कि शाहपुरा की सांस्कृतिक स्मृतियों, लोकदेवताओं, लोककथाओं, आस्था और जनजीवन को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत रखने वाली विरासत है। इसी गौरवशाली परंपरा को नई ऊंचाई तब मिली, जब शाहपुरा के फड़ कलाकार शांतिलाल जोशी, विजय जोशी और विवेक जोशी ने राष्ट्रपति भवन में अपनी कला का प्रदर्शन कर शाहपुरा का मान बढ़ाया।
राष्ट्रपति भवन में आयोजित ‘कलाकार निवास’ कार्यक्रम के अंतर्गत शाहपुरा के इन कलाकारों ने अपनी पारंपरिक फड़ चित्रकला का प्रतिनिधित्व किया। इस अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पारंपरिक कला से जुड़े कलाकारों से मुलाकात की और उनकी कला-साधना एवं रचनात्मकता को देखा। राष्ट्रपति भवन जैसे राष्ट्रीय मंच पर शाहपुरा की फड़ कला की मौजूदगी न केवल कलाकारों के लिए सम्मान का विषय बनी, बल्कि पूरे शाहपुरा के लिए गौरव का अवसर बन गई।
तीन कलाकार, तीन पीढ़ियों की साधना और एक समृद्ध परंपरा-
शांतिलाल जोशी, विजय जोशी और विवेक जोशी का राष्ट्रपति भवन में फड़ कला का प्रतिनिधित्व करना इस बात का प्रमाण है कि शाहपुरा की यह परंपरा किसी एक कलाकार या एक पीढ़ी तक सीमित नहीं है। यह गुरु-शिष्य परंपरा और पारिवारिक कला-साधना के माध्यम से निरंतर आगे बढ़ती रही है। शाहपुरा की फड़ चित्रकला राजस्थान की लोक संस्कृति, लोकदेवताओं, कथाओं और जनजीवन से गहराई से जुड़ी हुई है। फड़ में चित्र केवल दृश्य नहीं होते, बल्कि उनके माध्यम से लोककथाएं, आस्था, इतिहास और सामाजिक स्मृतियां पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहती हैं। यही कारण है कि शाहपुरा की फड़ को केवल एक चित्रकला शैली के रूप में देखना इसके व्यापक सांस्कृतिक महत्व को सीमित करना होगा।
शांतिलाल जोशी को राष्ट्रपति पुरस्कार 1991 सहित कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं। उनकी कला पर कई डॉक्यूमेंट्री भी बन चुकी हैं। विजय जोशी को राष्ट्रीय मेरिट पुरस्कार 2003, राष्ट्रीय फेलोशिप तथा भारत सरकार एवं राज्य स्तर के सम्मान प्राप्त हुए हैं। हाल ही में 24 मार्च 2026 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी उन्हें सम्मानित किया। वहीं विवेक जोशी को भारत सरकार की ओर से राष्ट्रीय स्कॉलरशिप और राष्ट्रीय फेलोशिप प्राप्त हो चुकी है।
‘विकसित भारत’ को रंगों में उतारने का प्रयोग–
राष्ट्रपति भवन में कलाकारों ने अपनी पारंपरिक शैली के माध्यम से ‘विकसित भारत’, भारतीय संस्कृति और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ जैसे समकालीन विषयों को चित्रों में अभिव्यक्त किया। यह प्रयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह संदेश सामने आया कि लोककला केवल अतीत की विरासत नहीं है, बल्कि वर्तमान और भविष्य के विचारों को अभिव्यक्त करने की भी सामर्थ्य रखती है। फड़ चित्रकला की पारंपरिक शैली, रंग-संयोजन, रेखांकन और कथा-विन्यास के माध्यम से आधुनिक विषयों को प्रस्तुत करना अपने आप में एक अनूठा प्रयोग रहा। इसने परंपरा और आधुनिक भारत की आकांक्षाओं के बीच एक खूबसूरत सांस्कृतिक सेतु का काम किया।
राष्ट्रपति भवन तक पहुंची शाहपुरा की फड़ कला यह बताती है कि हमारे छोटे शहर और कस्बे प्रतिभाओं से खाली नहीं हैं। आवश्यकता केवल इतनी है कि इन प्रतिभाओं की कहानी समाज तक पहुंचे, नई पीढ़ी उनसे परिचित हो और स्थानीय विरासत को लेकर गौरव की भावना मजबूत हो।
शाहपुरा के गौरव हैं तीनों कलाकार-
शांतिलाल जोशी, विजय जोशी और विवेक जोशी आज केवल अपने परिवार या कला जगत के गौरव नहीं हैं, बल्कि पूरे शाहपुरा के गौरव हैं। राष्ट्रपति भवन में उनके द्वारा शाहपुरा शैली की फड़ कला का प्रतिनिधित्व किया जाना इस शहर की सांस्कृतिक शक्ति को राष्ट्रीय मंच पर स्थापित करता है। इन तीनों कलाकारों की उपलब्धि शाहपुरा के युवाओं के लिए भी संदेश है कि अपनी जड़ों से जुड़कर भी दुनिया के बड़े मंचों तक पहुंचा जा सकता है। परंपरा को छोड़कर आधुनिकता अपनाना ही विकास नहीं हैय बल्कि अपनी परंपरा को समझकर उसे नए समय की भाषा में प्रस्तुत करना भी विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। शाहपुरा की फड़ कला में लोककथाओं और आस्था की गहराई है तो इन कलाकारों की साधना में समय के साथ चलने की क्षमता भी दिखाई देती है। राष्ट्रपति भवन में ‘विकसित भारत’ जैसे विषयों को फड़ शैली में प्रस्तुत करना इसी परिवर्तन का उदाहरण है।
विरासत को बचाने की जिम्मेदारी समाज की भी-
आज जब नई पीढ़ी डिजिटल माध्यमों और आधुनिक जीवनशैली की ओर तेजी से बढ़ रही है, ऐसे समय में पारंपरिक कलाओं को जीवित रखना केवल कलाकारों की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। समाज, संस्थाओं और स्थानीय मीडिया की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। कलाकारों के कार्य, उनकी कला-साधना, नई पीढ़ी को दिए जा रहे प्रशिक्षण, फड़ की तकनीक और उसके पीछे छिपी लोककथाओं को समाज के सामने लाने से इस विरासत के प्रति नई पीढ़ी का जुड़ाव मजबूत होगा।
राष्ट्रपति भवन में शाहपुरा की फड़ कला की प्रस्तुति ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि शाहपुरा की पहचान केवल इतिहास के पन्नों में नहीं, बल्कि वर्तमान भारत के सांस्कृतिक मानचित्र पर भी मजबूती से दर्ज है। शांतिलाल जोशी, विजय जोशी और विवेक जोशी ने रंगों और रेखाओं के माध्यम से शाहपुरा की आवाज को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया है। अब जरूरत है कि शाहपुरा का समाज इस गौरव को पहचाने, कलाकारों को सम्मान दे और इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने में सहभागी बने।
शाहपुरा की फड़ शाहपुरा की पहचान है और इन तीनों कलाकारों की साधना शाहपुरा का गौरव।



