शाहपुरा के सदर बाजार की सड़क पर सियासत का पेचवर्क, जनता के हिस्से में फिर धूल और गड्ढे!

14 लाख का टेंडर, वर्कऑर्डर भी जारी… फिर काम रोकने का फरमान किसका और क्यों?
शाहपुरा -मूलचन्द पेसवानी
शाहपुरा को आखिर हो क्या रहा है? शहर की धड़कन कहे जाने वाले सदर बाजार की सड़क बदहाल है, जनता परेशान है, व्यापारी रोजाना मुश्किलों से जूझ रहे हैं और जिम्मेदारों के पास शायद इस समस्या का कोई स्थायी समाधान ही नहीं है। करीब 14 लाख रुपए का टेंडर जारी हो चुका है। ठेकेदार को वर्कऑर्डर भी सौंपा जा चुका है। यानी सरकारी कागजों में सड़क सुधारने की तैयारी पूरी है, लेकिन जमीन पर काम शुरू होने के बजाय राजनीतिक और प्रशासनिक पेच फंसते जा रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस काम को कराने के लिए नगर पालिका ने टेंडर जारी किया, उसी काम को अब आगे बढ़ाने में अड़चनें क्यों खड़ी की जा रही हैं? वर्कऑर्डर जारी करने वाले अधिकारी ही यदि काम रुकवाने की स्थिति में हैं तो फिर जनता किससे उम्मीद करे? क्या किसी ऊपरी राजनीतिक निर्देश का इंतजार है या फिर सड़क की मरम्मत भी अब राजनीतिक सहमति और श्रेय की मोहताज हो गई है? यदि काम नहीं कराना है तो फिर टेंडर निरस्त कर दीजिए, लेकिन जनता को इस अनिश्चितता के बीच कब तक रखा जाएगा?

रात का पेचवर्क, सुबह फिर वही सड़क… जनता को मिला मरम्मत का भरोसा या प्रचार का तमाशा?
विगत रात्रि सदर बाजार में पेचवर्क को लेकर जो कुछ हुआ, उसने पूरे मामले को और दिलचस्प बना दिया। लाख जतन के बाद सड़क पर कुछ जगह पेचवर्क कराने की कवायद हुई। मौके पर लोगों की मौजूदगी रही, माहौल ऐसा बनाया गया मानो शाहपुरा की सड़क समस्या का ऐतिहासिक समाधान हो गया हो। सोशल मीडिया पर भी वाहवाही बटोरने का दौर चला। तस्वीरों और संदेशों के जरिए उपलब्धि का संदेश देने की कोशिश हुई।
लेकिन असली परीक्षा तो अगली सुबह हुई। जब बाजार के दुकानदारों और आम नागरिकों ने सड़क को देखा तो उत्साह की जगह निराशा हाथ लगी। लोगों को एक बार फिर ठगा सा महसूस हुआ। सवाल उठा कि आखिर रात में इतनी बड़ी कवायद किसलिए थी? कितने गड्ढे भरे गए और कितने जस के तस छोड़ दिए गए? सड़क की वास्तविक स्थिति में कितना सुधार हुआ? इसका जवाब सड़क खुद दे रही है।
विडंबना यह है कि इससे पहले भी जनता इस तरह के आश्वासन और अधूरे प्रयास देख चुकी है। रात में मरम्मत की उम्मीद जगती है और सुबह होते-होते वह उम्मीद फिर गड्ढों में समा जाती है। सड़क सुधारने के नाम पर यदि केवल कुछ स्थानों पर औपचारिकता निभानी है तो उसे विकास कार्य कहना भी विकास शब्द के साथ अन्याय होगा।
पीएचईडी ने खोदी सड़क, मरम्मत की जिम्मेदारी आखिर किसकी?
सदर बाजार की बदहाली के पीछे एक बड़ा कारण पीएचईडी की ओर से की गई खुदाई भी है। पेयजल लाइन के काम के दौरान सड़क को खोदा गया, लेकिन काम पूरा होने के बाद सड़क को जिस गुणवत्ता के साथ वापस दुरुस्त किया जाना चाहिए था, वह नजर नहीं आ रहा। सवाल यह भी है कि खुदाई के बाद सड़क की मरम्मत किस गुणवत्ता से हुई, इसकी जांच किसने की और संबंधित विभाग ने अपने दायित्व का कितना निर्वहन किया?
सरकारी कामों में सड़क खोदने की अनुमति देने से लेकर उसे वापस ठीक कराने तक जिम्मेदारियां तय होती हैं। गुणवत्ता जांचने के लिए भी विभागीय व्यवस्था होती है। फिर क्या कारण है कि आम नागरिकों को हर दिन उसी खराब सड़क से गुजरना पड़ रहा है? क्या विभागों के बीच जिम्मेदारी भी सड़क के गड्ढों की तरह एक-दूसरे को सौंप दी गई है?
चुनाव खत्म, अब सड़क के श्रेय की नई चुनावी पिच!
नगर पालिका चुनाव संपन्न हो चुके हैं। जनता ने अपना जनमत दे दिया है। अब उम्मीद थी कि शहर के बुनियादी मुद्दों पर काम होगा, लेकिन सदर बाजार की सड़क को देखकर लगता है कि यहां विकास से ज्यादा श्रेय लेने की होड़ महत्वपूर्ण हो गई है।
काम कौन करवाएगा, इसका फैसला होने से पहले श्रेय कौन लेगा, इस पर ज्यादा दिलचस्पी दिखाई दे रही है। राजनीतिक महत्वाकांक्षा अपनी जगह है। जनप्रतिनिधियों को काम कराने और उसका श्रेय लेने का पूरा अधिकार है। जनता को इससे कोई आपत्ति भी नहीं है। बल्कि जनता तो चाहती है कि कोई आगे आए, जिम्मेदारी उठाए और सड़क को दुरुस्त करवाए। लेकिन श्रेय की राजनीति में सड़क की मरम्मत ही उलझ जाए तो यह जनमत का सम्मान नहीं, बल्कि जनता की परेशानी बढ़ाने जैसा है।
प्रशासन के आला अधिकारियों तक कई ज्ञापन पहुंच चुके हैं। शिकायतें की जा चुकी हैं। लोग अपनी समस्या बता चुके हैं। लेकिन कार्रवाई के नाम पर ज्ञापन लेने और आश्वासन देने की परंपरा ही अधिक प्रभावी नजर आ रही है। नगर पालिका के जिम्मेदार अधिकारियों का रवैया भी ऐसा प्रतीत होता है मानो सदर बाजार की समस्या उनकी प्राथमिकता में ही नहीं है।
दीपावली पर बाजार में रामा-श्यामा होगी या गड्ढों से बचने की कवायद?
इस बार शाहपुरा की दीपावली खास है। शहरवासी बाजारों में खरीदारी करेंगे, रिश्तेदारों और परिचितों से रामा-श्यामा करने निकलेंगे। व्यापारी अपनी दुकानों को सजाएंगे, बाजार में रौनक होगी। लेकिन इसी रौनक के बीच सदर बाजार की क्षतिग्रस्त सड़क लोगों की परेशानी का कारण बनी रहेगी।
त्योहार पर बाजार में भीड़ बढ़ेगी। बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे और बाहर से आने वाले ग्राहक इसी सड़क से गुजरेंगे। दोपहिया वाहन चालक गड्ढों से बचेंगे तो पैदल चलने वालों को धूल और असुविधा का सामना करना पड़ेगा। त्योहार खुशियों का है, लेकिन सड़क की हालत देखकर लगता है कि इस बार लोगों को दीपावली की खरीदारी से ज्यादा गड्ढों से बचने की तैयारी करनी पड़ेगी।
जनता का सवाल सीधा है… सड़क बनाइए, श्रेय बाद में ले लीजिए!
सदर बाजार की सड़क कोई राजनीतिक दल या व्यक्ति विशेष की निजी संपत्ति नहीं है। यह पूरे शहर की जरूरत है। इसका निर्माण और रखरखाव नगर पालिका तथा संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है। करीब 14 लाख रुपए का टेंडर जारी होने और वर्कऑर्डर दिए जाने के बाद भी काम आगे नहीं बढ़ना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
प्रशासन को चाहिए कि वह तत्काल स्थिति स्पष्ट करे। यदि टेंडर वैध है तो ठेकेदार से निर्धारित शर्तों के अनुसार काम शुरू करवाया जाए। यदि कोई तकनीकी या प्रशासनिक अड़चन है तो उसे सार्वजनिक किया जाए। पीएचईडी की ओर से की गई खुदाई की गुणवत्ता और सड़क की मरम्मत की जांच हो तथा अधूरे पेचवर्क के बजाय पूरी सड़क को निर्धारित मानकों के अनुसार दुरुस्त कराया जाए।
जनता ने जनप्रतिनिधियों को इसलिए नहीं चुना कि वे सड़क पर खड़े होकर मरम्मत की तस्वीरें खिंचवाएं, बल्कि इसलिए चुना है कि शहर की समस्याओं का समाधान हो। अधिकारियों को भी यह समझना होगा कि सरकारी आदेशों का उद्देश्य जनता को सुविधा देना है, न कि फाइलों में काम पूरा दिखाना।
आखिरकार सवाल वही है शाहपुरा को हो क्या रहा है? 14 लाख का टेंडर है, वर्कऑर्डर है, ठेकेदार है, अधिकारी हैं, जनप्रतिनिधि हैं, ज्ञापन हैं और सोशल मीडिया पर वाहवाही भी है। बस एक चीज गायब है… सदर बाजार की ढंग से बनी हुई सड़क!
बाकी जनता सब समझ रही है। किसकी मंशा क्या है, किसका पेच कहां फंसा है और किसे श्रेय की चिंता है। अब देखना यह है कि दीपावली से पहले सड़क सुधरती है या फिर इस बार भी शहरवासी गड्ढों के बीच ही एक-दूसरे को रामा-श्यामा करेंगे। क्योंकि विकास का असली प्रमाण सोशल मीडिया की पोस्ट नहीं, सड़क पर चलती जनता की राहत है। बाकी तो राम ही जाने!



