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अहंकार छोड़ो, भगवान को पकड़ो… तभी जीवन की नैया होगी पार


शिव महापुराण कथा में गूंजा भक्ति का संदेश, ‘नारद मोह’ और ‘कुबेर चरित्र’ ने श्रद्धालुओं को किया भावविभोर

भीलवाड़ा।  मूलचन्द पेसवानी
“धन, पद और ज्ञान का अभिमान मनुष्य को पतन की ओर ले जाता है, लेकिन भगवान की भक्ति उसे मोक्ष के मार्ग पर पहुंचा देती है।” यही प्रेरणादायी संदेश श्रीशिव महापुराण कथा महोत्सव के तृतीय दिवस पर श्रद्धालुओं को मिला, जब कथाव्यास प्रखर वक्ता डॉ. स्वामी निर्मल दास जी महाराज ने अपनी ओजस्वी वाणी से पूरे पंडाल को शिवमय बना दिया। सनातन सेवा समिति, हरि सेवा उदासीन आश्रम सनातन मंदिर एवं महामंडलेश्वर स्वामी श्री हंसराम जी उदासीन महाराज के सान्निध्य में आयोजित कथा में हजारों श्रद्धालु भक्ति रस में सराबोर नजर आए।



‘नारद मोह’ से मिला विनम्रता का संदेश

कथा के दौरान स्वामी जी ने ‘नारद मोह’ का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि कठोर तपस्या और साधना के बल पर कामदेव को पराजित करने के बाद देवर्षि नारद के मन में सूक्ष्म अहंकार उत्पन्न हो गया। अपने परम भक्त का कल्याण करने के लिए भगवान विष्णु ने अपनी दिव्य माया का विस्तार किया और स्वयंवर की लीला रची। मोह के जाल में फंसने के बाद जब नारद जी को अपनी भूल का एहसास हुआ, तब उनका अभिमान समाप्त हो गया और उन्होंने प्रभु की शरण ग्रहण की।

स्वामी जी ने कहा कि यह प्रसंग हर व्यक्ति को सीख देता है कि ज्ञान, तप, पद और सामर्थ्य का अहंकार भी आध्यात्मिक पतन का कारण बन सकता है। भगवान अपने भक्तों को विनम्र बनाकर ही उनका वास्तविक कल्याण करते हैं।

कुबेर की महानता धन में नहीं, शिवभक्ति में

कथा में ‘कुबेर चरित्र’ का वर्णन करते हुए स्वामी जी ने बताया कि कुबेर ने पूर्व जन्म में भगवान शिव की अनन्य भक्ति और कठोर तपस्या की थी। उनकी निष्ठा और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें धन के अधिपति और देवताओं के कोषाध्यक्ष का पद प्रदान किया।

उन्होंने कहा कि कुबेर की वास्तविक महानता उनके अथाह वैभव में नहीं, बल्कि उनकी अटूट शिवभक्ति में निहित है। सच्ची श्रद्धा और तप के बल पर साधारण व्यक्ति भी असाधारण ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकता है। धन तभी सार्थक है जब उसका उपयोग धर्म, सेवा और लोककल्याण के कार्यों में किया जाए।

“संपत्ति नहीं, परमात्मा को मांगो”

महाभारत का प्रसंग सुनाते हुए स्वामी जी ने कहा कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन और दुर्योधन को विकल्प दिया, तब दुर्योधन ने विशाल सेना चुनी, जबकि अर्जुन ने स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को चुना। यही मांगने की सच्ची कला है। यदि भगवान साथ हों तो सभी प्रकार की संपत्तियां और सफलताएं स्वतः प्राप्त हो जाती हैं तथा जीवन की नैया सहज ही पार लग जाती है।

शिवलिंग पूजन और गुरु दीक्षा का बताया महत्व

स्वामी जी ने पार्थिव शिवलिंग पूजन की महिमा बताते हुए कहा कि शास्त्रों में विभिन्न मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए पार्थिव शिवलिंग निर्माण एवं विधिपूर्वक पूजन का विशेष विधान है। उन्होंने कहा कि धन, भूमि, वस्त्र और सुयोग्य संतान की प्राप्ति के लिए श्रद्धा एवं नियमपूर्वक भगवान शिव की आराधना अत्यंत फलदायी मानी गई है।

उन्होंने यह भी कहा कि शिवपुराण केवल कर्मकांड का ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को धर्ममय बनाने का मार्गदर्शक है। जिस प्रकार रास्ता भटकने पर किसी जानकार से मार्ग पूछा जाता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है। गुरु दीक्षा के साथ की गई साधना साधक को आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करती है।

भजनों से शिवमय हुआ वातावरण

कथा के समापन पर “ब्रह्मा मुरारी सुरार्चित लिंगम्…” सहित अनेक स्तुतियों और भजनों का सामूहिक गायन हुआ। विशेष रूप से भजन “पकड़ लो बाँह रघुराई, नहीं तो डूब जाएँगे…” ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। इसकी पंक्तियों “डगर ये अगमल अनजानी, पथिक मैं मूढ़ अज्ञानी” का भाव समझाते हुए स्वामी जी ने कहा कि जीवन की यात्रा कठिन है और प्रभु का सहारा ही मनुष्य को मोह, अहंकार और विकारों से बचा सकता है।

भजन के दौरान श्रद्धालु भक्ति में झूम उठे और पूरा पंडाल “ॐ नमः शिवाय” तथा “जय भोले” के जयघोष से गुंजायमान हो गया।

यज्ञ, रुद्राभिषेक और भव्य गंगा आरती का आयोजन

कथा के उपरांत श्रद्धालुओं ने भगवान शिव की आरती में भाग लेकर पूजन-अर्चन किया तथा प्रसाद ग्रहण किया। इससे पूर्व प्रातःकालीन श्री विष्णु यज्ञ में कैलाश चंद्र, कन्हैया मोरयानी, हरीश-निशा आडवाणी, राजा-वर्षा टिक्यानी, रमेश मूंदड़ा एवं हनुमान प्रसाद अग्रवाल सहित अनेक श्रद्धालुओं ने विश्व शांति एवं जनकल्याण की कामना से आहुतियां अर्पित कीं और महादेव का रुद्राभिषेक किया।

आश्रम के संत मायाराम जी एवं संत गोविंदराम जी ने बताया कि प्रतिदिन सायंकाल काशी की तर्ज पर भव्य गंगा आरती, दुर्गा सप्तशती पाठ और अखंड रामधुन का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं से पुरुषोत्तम मास में आयोजित इन धार्मिक कार्यक्रमों में सहभागी बनकर पुण्य लाभ अर्जित करने का आह्वान किया।

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