सरपंच बनी बहू, सास ने पंचायत को दान कर दी 20 लाख की जमीन

अखेपुर में पंचायत भवन के लिए परिवार ने खोला जमीन का खजाना
नवगठित ग्राम पंचायत को भवन के लिए सौंपी सवा बीघा भूमि, रजिस्ट्री होते ही पंचायत भवन निर्माण का रास्ता साफ
शाहपुरा, मूलचन्द पेसवानी
पंचायत राज व्यवस्था में जनप्रतिनिधि का दायित्व केवल चुनाव जीतने और पद संभालने तक सीमित नहीं होता, बल्कि गांव के विकास के लिए संसाधन जुटाना और जनसमस्याओं का समाधान करना भी उसकी जिम्मेदारी है। भीलवाड़ा जिले की कोटड़ी तहसील के अखेपुर गांव में नवनिर्वाचित सरपंच रतनदेवी भवानी जाट के परिवार ने इसी भावना को जमीन पर उतारते हुए अनूठी मिसाल पेश की है। गांव में ग्राम पंचायत भवन बनाने के लिए एक इंच भूमि तक उपलब्ध नहीं थी। इस समस्या को दूर करने के लिए सरपंच के परिवार ने अपनी खातेदारी भूमि पंचायत को समर्पित करने का निर्णय किया। परिवार की मुखिया 85 वर्षीय बुजुर्ग रामप्यारी देवी ने करीब सवा बीघा, यानी 0.18 हेक्टेयर भूमि ग्राम पंचायत के नाम रजिस्ट्री करवा दी। इस जमीन का बाजार मूल्य करीब 20 लाख रुपए बताया गया है।
करवा चैथ पर दिया गांव को विकास का उपहार-
ग्राम पंचायत अखेपुर के लिए यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि पंचायत के पास अपना भवन बनाने के लिए जमीन ही नहीं थी। ऐसे में पंचायत का स्थायी कार्यालय और अन्य आवश्यक सरकारी भवन विकसित करने की राह अटकी हुई थी। ग्रामीणों के सहयोग से सरपंच निर्वाचित हुईं रतनदेवी भवानी जाट ने पदभार संभालने के बाद इस समस्या पर परिवार के साथ चर्चा की। विचार-विमर्श के दौरान तय हुआ कि गांव की इस जरूरत को पूरा करने के लिए परिवार की भूमि पंचायत को दान कर दी जाए।
सरपंच ने अपने पति भवानी जाट से बात की तो उन्होंने सहमति दे दी। संबंधित भूमि उनकी माता रामप्यारी देवी के नाम पर दर्ज थी। परिवार ने उनसे आग्रह किया तो उन्होंने भी खुशी-खुशी जमीन पंचायत को देने का निर्णय कर लिया। इसके बाद चुनाव परिणाम आने के एक सप्ताह के भीतर ही भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी करने की पहल की गई।
गुरुवार को करवा चैथ के अवसर पर रामप्यारी देवी अपने पुत्र भवानी जाट और दो गवाहों के साथ कोटड़ी तहसील कार्यालय पहुंचीं। यहां तहसीलदार रमेशचंद्र मीणा के समक्ष ग्राम पंचायत अखेपुर के नाम 0.18 हेक्टेयर भूमि की रजिस्ट्री करवाई गई। वैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद रजिस्ट्री सरपंच रतनदेवी को सौंप दी गई।
85 साल की उम्र में भी गांव के भविष्य की चिंता-
रामप्यारी देवी की इस पहल को ग्रामीण केवल जमीन के दान के रूप में नहीं, बल्कि गांव के विकास में अपनी हिस्सेदारी निभाने के उदाहरण के तौर पर देख रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव पर उन्होंने निजी संपत्ति का उपयोग सामुदायिक आवश्यकता के लिए करने का निर्णय लिया। करीब 20 लाख रुपए मूल्य की भूमि पंचायत को सौंपने से अब अखेपुर में पंचायत भवन निर्माण की संभावनाएं आगे बढ़ी हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत भवन किसी एक परिवार या जनप्रतिनिधि की जरूरत नहीं, बल्कि पूरे गांव की प्रशासनिक व्यवस्था का केंद्र होता है। यहां ग्रामीणों को पंचायत संबंधी कार्यों के लिए सुविधा मिलती है और स्थानीय स्तर पर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन को गति मिल सकती है। ऐसे में भूमि उपलब्ध होने से गांव की वर्षों पुरानी जरूरत पूरी होने की उम्मीद जगी है।
अब भवन निर्माण का प्रस्ताव तैयार होगा-
सरपंच प्रतिनिधि भवानीराम जाट ने बताया कि पंचायत का कामकाज सुचारु रूप से संचालित करने और गांव में पंचायत भवन की जरूरत को देखते हुए परिवार ने यह पहल की है। भूमि की रजिस्ट्री होने के बाद अब पंचायत भवन निर्माण का प्रस्ताव तैयार कर उसे स्वीकृत कराने की दिशा में काम किया जाएगा। प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद निर्माण कार्य शुरू कराने का प्रयास रहेगा।
तहसीलदार रमेशचंद्र मीणा ने बताया कि नवगठित ग्राम पंचायत अखेपुर में पंचायत भवन के लिए भूमि उपलब्ध नहीं थी। अब पंचायत के नाम भूमि की रजिस्ट्री होने से भवन निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
पंचायत राज की भावना को मिला नया अर्थ-
अखेपुर की यह पहल पंचायत राज की उस मूल भावना को रेखांकित करती है, जिसमें गांव के विकास को सामूहिक जिम्मेदारी माना जाता है। चुनाव के दौरान ग्रामीण जिस विश्वास के साथ जनप्रतिनिधि चुनते हैं, उस विश्वास को विकास कार्यों में बदलने के लिए जनप्रतिनिधि और समाज की भागीदारी महत्वपूर्ण होती है।
सरपंच के परिवार ने भूमि उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी उठाई है। अब पंचायत और प्रशासन के सामने इस जमीन पर आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर भवन निर्माण को आगे बढ़ाने की चुनौती है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि यहां आधुनिक सुविधाओं से युक्त पंचायत भवन तैयार होगा और अखेपुर की नई पंचायत को अपना स्थायी ठिकाना मिलेगा।
एक परिवार का समर्पण, पूरे गांव के काम आएगा। अखेपुर में 85 वर्षीय रामप्यारी देवी द्वारा जमीन दान करने की यह पहल बताती है कि गांव के विकास की शुरुआत केवल सरकारी बजट से नहीं, बल्कि समाज की भागीदारी और साझा संकल्प से भी हो सकती है।



